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New Labour Laws: मजदूर या कॉर्पोरेट हित? काले कानूनों के साए में श्रमिक

New Labour Laws: नवंबर 2025 में अधिसूचित नए श्रम कानूनों का विरोध कोई अचानक उपजा आवेग नहीं है। यह असंतोष उस लंबे मौन का परिणाम है, जिसे सुनने की फुर्सत न सरकार के पास है, न मुख्यधारा मीडिया के पास। जब मुद्दा उद्योग, निवेश और ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ का हो, तब श्रमिकों की आवाज़ अक्सर विकास के शोर में दब जाती है। और यही वह क्षण है जब भारत बंद जैसे आह्वान जन्म लेते हैं—अपनी अनसुनी आवाज़ को सत्ता के बहरे कानों तक पहुँचाने की एक सामूहिक कोशिश के रूप में।

पर सवाल यह है कि क्या अपना वजूद खोती ट्रेड यूनियनें इस प्रतिरोध को प्रभावी बना पाएंगी?

श्रमिक की मजबूरी बनाम प्रतिरोध की राजनीति

आज का श्रमिक दो वक्त की रोटी और बच्चों की पढ़ाई के बीच झूलता हुआ नागरिक है। वह जानता है कि उसका वेतन भले ही “न्यूनतम” हो, पर उसके बिना घर का चूल्हा नहीं जलेगा। ऐसे में विरोध का अर्थ है अनिश्चितता को आमंत्रण देना। यदि काम बंद हुआ और वेतन भी बंद हो गया तो वह क्या करेगा? यही वह भय है, जो प्रतिरोध की लौ को भीतर ही भीतर बुझा देता है।

कारपोरेट और निजी मालिकान इस मनोविज्ञान को भलीभांति समझते हैं। श्रमिक की असुरक्षा ही उनका सबसे बड़ा हथियार है। न्यूनतम मजदूरी के साथ अधिकतम शोषण का यह मॉडल अब कानूनी संरक्षण के साथ खड़ा दिखाई देता है।

300 कर्मचारियों की सीमा और छंटनी की खुली छूट

नए कानूनों के तहत 300 तक कर्मचारियों वाली कंपनियों को छंटनी या इकाई बंद करने के लिए सरकारी अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी। इसे उद्योगों के लिए ‘लचीलापन’ कहा जा रहा है, लेकिन श्रमिकों के लिए यह ‘अनिश्चितता’ का पर्याय बन सकता है।

पहले जहां सरकार की अनुमति एक न्यूनतम सुरक्षा कवच थी, अब वह भी हटाया जा रहा है। इसका अर्थ है कि रोजगार स्थायित्व की जगह अस्थायीपन और भय का वातावरण और गहरा होगा। हर कर्मचारी इस आशंका में काम करेगा कि कब मालिक की नजर तिरछी हो जाए और वह बाहर का रास्ता दिखा दे। जो भय पहले अनौपचारिक था, अब उसे विधिक वैधता मिल रही है।

यूनियनों की शक्ति में क्षरण

हड़ताल के लिए कड़े नियम और प्रक्रियात्मक बाधाएं सामूहिक मोलभाव की ताकत को कमजोर करती हैं। जब यूनियनें नोटिस, समयसीमा और कानूनी उलझनों में उलझ जाएं, तो संघर्ष की धार कुंद हो जाती है। परिणामस्वरूप श्रमिक अकेला पड़ जाता है—व्यवस्था के सामने, मालिक के सामने, और अंततः अपने ही भय के सामने।

ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि ये सुधार ‘मजदूर विरोधी’ और ‘कॉर्पोरेट समर्थक’ हैं। सरकार का तर्क है कि निवेश और उत्पादन बढ़ेगा, जिससे रोजगार के अवसर सृजित होंगे। लेकिन प्रश्न यह है कि यदि रोजगार की गुणवत्ता और सुरक्षा ही दांव पर लग जाए, तो मात्र संख्या का क्या अर्थ रह जाता है?

12 घंटे का कार्यदिवस: विकास या दबाव?

काम के घंटों को 12 घंटे तक बढ़ाने का प्रावधान भी चिंता का विषय है। इसे उत्पादन क्षमता और प्रतिस्पर्धात्मकता के नाम पर उचित ठहराया जा सकता है, पर इसका सामाजिक और मानसिक प्रभाव क्या होगा? क्या श्रमिक मशीन है, जिसे अधिक समय तक चलाकर अधिक उत्पादन लिया जा सकता है? या वह एक मनुष्य है, जिसके पास परिवार, स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन भी है?

अत्यधिक कार्यदिवस न केवल शारीरिक थकावट बढ़ाता है, बल्कि मानसिक तनाव और असंतोष भी जन्म देता है। दीर्घकाल में यह उत्पादकता को बढ़ाने के बजाय घटा भी सकता है।

सरकार की भूमिका: मध्यस्थ या पक्षकार?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार से अपेक्षा होती है कि वह उद्योग और श्रमिक—दोनों के बीच संतुलन साधे। लेकिन जब नीतियों में झुकाव एक ओर अधिक दिखाई देता है, तो अविश्वास पनपता है। यदि श्रमिक यह महसूस करने लगे कि सरकार उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट घरानों की ‘कठपुतली’ बन गई है, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

व्यावसायिक सुगमता आवश्यक है, पर सामाजिक न्याय उससे कम आवश्यक नहीं। विकास यदि असमानता को और गहरा करे, तो वह अंततः सामाजिक असंतोष को जन्म देता है।

भारत बंद: प्रतीक या परिवर्तन?

भारत बंद का आह्वान एक प्रतीकात्मक कदम है—सत्ता को यह बताने का प्रयास कि असंतोष जीवित है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या श्रमिक अपने भय से ऊपर उठ पाते हैं। जब हर व्यक्ति अपनी रोजी-रोटी के लिए संघर्षरत हो, तब सामूहिक संघर्ष कठिन हो जाता है।

https://x.com/AIBOAOFFICIAL/status/2018618076842070485?s=20

फिर भी इतिहास गवाह है कि श्रम अधिकार कभी भी सहज रूप से नहीं मिले; वे संघर्ष से ही अर्जित हुए। आज भी प्रश्न वही है—क्या श्रमिक अपनी असुरक्षा के खिलाफ संगठित हो पाएंगे, या भय और मजबूरी उनके प्रतिरोध को दबा देंगे?

अंततः सवाल

नए श्रम कानूनों को सुधार कहा जाए या पुनर्संरचना, यह बहस जारी रहेगी। पर असली प्रश्न यह है कि विकास की इस दौड़ में श्रमिक की गरिमा, सुरक्षा और अधिकार कहाँ खड़े हैं? यदि न्यूनतम मजदूरी के साथ अधिकतम असुरक्षा ही नियति बन जाए, तो लोकतंत्र के सामाजिक आधार कमजोर पड़ सकते हैं।

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सुधार तभी सार्थक होंगे, जब वे संतुलित हों—जहाँ उद्योग बढ़े, पर इंसान न घटे। जहाँ निवेश आए, पर श्रमिक की आवाज़ भी सुनी जाए। वरना इतिहास यही लिखेगा कि विकास के नाम पर श्रम का मूल्य चुकाया गया, और वह भी सबसे अधिक उसी ने चुकाया, जो सबसे कमज़ोर था।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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