जल जीवन मिशन: सवाल पानी का या राजनीति का?
सरकार की महत्वाकांक्षी योजना जल जीवन मिशन इन दिनों पानी से ज्यादा राजनीति की वजह से चर्चा में है। “हर घर नल” का सपना कागज़ पर जितना चमकदार दिखता है, ज़मीन पर उतना ही उलझा हुआ नज़र आ रहा है। मामला सिर्फ पाइपलाइन, टंकी या कनेक्शन का नहीं है; मामला जवाबदेही का है। और जब जवाबदेही पर सवाल उठता है, तो राजनीति असहज हो जाती है।
महोबा के चरखारी से भाजपा विधायक ब्रजभूषण राजपूत ने जो मुद्दा उठाया है, वह विपक्ष का आरोप नहीं है। यह सत्तारूढ़ दल के भीतर से उठी आवाज़ है। विधायक का कहना है कि जल जीवन मिशन के तहत हो रहे कार्यों में गड़बड़ियां सिर्फ उनके क्षेत्र में नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में हैं। वीडियो, शिकायतें और अधूरे काम—ये सब उनके पास प्रमाण के तौर पर मौजूद हैं। सवाल यह है कि अगर एक जनप्रतिनिधि दो साल से पत्र लिख रहा है, विधानसभा में मुद्दा उठा चुका है, और फिर भी सुनवाई नहीं होती, तो समस्या कहां है?
विवाद का केंद्र मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह हैं। विधायक का दावा है कि मंत्री ने 20 दिन का समय दिया है और वह इंतजार कर रहे हैं। यह इंतजार सिर्फ एक विधायक का नहीं, उस क्षेत्र की जनता का भी है, जिसकी सड़कें खुदी हैं, पाइपलाइन अधूरी है और नलों में पानी नहीं पहुंचा। विधायक का कहना है—काम पूरा हो जाए तो वह मंत्री का ऐतिहासिक स्वागत करेंगे। यानी लड़ाई व्यक्तिगत नहीं, काम की है। लेकिन राजनीति में मुद्दे अक्सर अपने मूल रूप में नहीं रहते।
दिलचस्प यह है कि इस पूरे विवाद को “लोध बनाम कुर्मी” का रंग देने की कोशिश भी सामने आई। जब तर्क कमजोर पड़ते हैं, तब पहचान की राजनीति आसान रास्ता बन जाती है। मूल सवाल—योजना की पारदर्शिता और क्रियान्वयन—से ध्यान हटाकर जातीय समीकरणों में उलझा दिया जाता है। विधायक ने साफ कहा है कि इसे दो जातियों की लड़ाई बताना अनुचित है। वह खुद को सिर्फ क्षेत्र की जनता का प्रतिनिधि बता रहे हैं। अगर एक जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठाता है, तो उसे जातीय चश्मे से क्यों देखा जाए?
यहां एक और परत है—अधिकारी बनाम जनप्रतिनिधि। विधायक का आरोप है कि अधिकारी फर्जी आंकड़े दे रहे हैं और जमीनी हकीकत छिपा रहे हैं। अगर यह सही है, तो यह सिर्फ एक जिले का मामला नहीं, पूरी व्यवस्था का प्रश्न है। योजनाएं दिल्ली या लखनऊ में बनती हैं, लेकिन उनका मूल्यांकन गांव की पगडंडी पर होता है। अगर वहां पानी नहीं पहुंचा, तो प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए आंकड़े अर्थहीन हो जाते हैं।
जल जीवन मिशन बुंदेलखंड जैसे सूखाग्रस्त इलाके के लिए सचमुच वरदान साबित हो सकता है। पानी सिर्फ सुविधा नहीं, जीवन है। लेकिन जब ठेकेदारी, लापरवाही और कागजी प्रगति हावी हो जाए, तो योजना का उद्देश्य धुंधला पड़ जाता है। विधायक का यह कहना कि “मोदी की योजना को अधिकारी खा जाना चाहते हैं”—दरअसल एक राजनीतिक वाक्य भर नहीं, बल्कि उस असंतोष की अभिव्यक्ति है जो ज़मीनी स्तर पर महसूस किया जा रहा है।
मंत्री की स्थिति भी आसान नहीं है। अगर वह विधायक की बात को नकारते हैं, तो यह संदेश जाएगा कि सरकार अपने ही प्रतिनिधि की शिकायत को गंभीरता से नहीं ले रही। और अगर शिकायत सही निकलती है, तो प्रशासनिक तंत्र पर सवाल उठेंगे। इसलिए 20 दिन की समय-सीमा अब सिर्फ तकनीकी नहीं, राजनीतिक भी हो गई है।
https://x.com/INCIndia/status/2017961138743369836?s=20
इस पूरे प्रकरण में असली सवाल यही है—क्या लोकतंत्र में सत्तारूढ़ दल का विधायक भी व्यवस्था से सवाल पूछ सकता है? या सवाल पूछने का अधिकार सिर्फ विपक्ष तक सीमित है? अगर एक विधायक अपने क्षेत्र की पीड़ा को सामने लाता है और उसे असहजता के बजाय समाधान मिलता है, तो यह लोकतंत्र की मजबूती होगी। लेकिन अगर उसे चुप कराने की कोशिश होती है, तो संदेश उल्टा जाएगा।
फिलहाल विधायक अडिग हैं। उनका कहना है कि 20 दिन में समाधान न हुआ, तो तेवर और तीखे होंगे। यह चेतावनी कम, जिम्मेदारी ज्यादा लगती है। क्योंकि जो व्यक्ति खुद को जनता के प्रति जवाबदेह मानता है, उसे दर्द होगा। और जिसे जनता का दर्द महसूस ही न हो, वह इस राजनीति को शायद समझ भी न पाए।
https://tesariaankh.com/politics-aamdani-doguni-ka-sach-jameer-banamm-jumle/
जल जीवन मिशन की असली परीक्षा पाइपलाइन की लंबाई या टेंडर की राशि से नहीं होगी। उसकी परीक्षा उस दिन होगी, जब बुंदेलखंड के किसी घर में पहली बार नल से पानी बहेगा और वह बिना किसी राजनीतिक शोर के बहेगा। तब यह विवाद भी खत्म हो जाएगा। लेकिन जब तक सवाल बाकी हैं, तब तक चर्चा भी जारी रहेगी—और रहनी भी चाहिए।








