जमीर या अंतरात्मा का मर जाना कोई एक दिन की घटना नहीं होती। यह एक लंबी प्रक्रिया है, जो तब पूरी होती है जब सत्ता और विपक्ष—दोनों—अपने मूल उद्देश्य को भूल जाते हैं। भारतीय राजनीतिक परिवेश को अगर ध्यान से देखा जाए, तो यह सवाल अपने-आप सामने खड़ा हो जाता है कि आखिर हमारे जनप्रतिनिधि चुने ही क्यों जाते हैं? क्या वे किसी प्रतियोगी परीक्षा में चयनित होकर लाखों के पैकेज पर नौकरी करने आए हैं, या जनता की आवाज़ बनकर व्यवस्था से सवाल पूछने?
आज राजनीति में जवाबदेही की जगह जुमलों ने ले ली है। हाल ही में अख़बारों की सुर्खियों में दावा किया गया कि “यूपी वालों की आमदनी दोगुनी हो गई है।” यह पंक्ति जितनी बड़ी है, उतनी ही खोखली भी। कहां दोगुनी हुई? कब हुई? किसकी हुई? इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं। न आंकड़ों की स्पष्टता है, न ज़मीनी सच्चाई। यह एक ऐसा जुमला है, जिसे बार-बार दोहराकर सच साबित करने की कोशिश की जा रही है—कुछ वैसी ही, जैसी इतिहास में प्रचार की बदनाम मिसालें रही हैं।
अगर यह कहा जाता कि महंगाई दोगुनी हो गई है, तो शायद आम आदमी बिना बहस के मान भी लेता। क्योंकि वह रोज़ सब्ज़ी मंडी, किराना दुकान और गैस सिलेंडर पर यही अनुभव कर रहा है। लेकिन आमदनी दोगुनी होने का दावा उस व्यक्ति के लिए मज़ाक से कम नहीं, जिसकी तनख्वाह पिछले दस साल से वहीं अटकी है। जो दस साल पहले 15 या 20 हजार रुपये कमा रहा था, आज भी लगभग उतना ही कमा रहा है—बस खर्च कई गुना बढ़ गया है।
सरकारी कर्मचारी अगर इस दायरे में आते भी हों, तो वजह साफ है—वेतन आयोग। लेकिन आम आदमी? निजी नौकरी करने वाला युवा? ठेके पर रखा गया कर्मचारी? सरकार अगर स्थायी भर्तियां करे, तो शायद आय बढ़ने की बात समझ में आए। लेकिन यहां तो ठेकेदारी प्रथा का बोलबाला है—15 से 20 हजार रुपये की नौकरी, बिना सुरक्षा, बिना भविष्य।
एजेंसियों को करोड़ों के ठेके मिलते हैं, लेकिन जिनसे असल काम लिया जाता है, उनके लिए न न्यूनतम वेतन का कोई पैमाना है, न सामाजिक सुरक्षा। छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी वाले, स्थानीय कारोबारी—इनमें से कौन कह सकता है कि उसकी आमदनी दोगुनी हो गई? हां, यह जरूर माना जा सकता है कि गिनती के बड़े पूंजीपतियों और उद्योगपतियों की कमाई कई गुना बढ़ी है। लेकिन क्या वही पूरा प्रदेश है? क्या वही “यूपी वाले” हैं?
सत्ता पक्ष जश्न में है, विपक्ष खामोशी में—और जनता भ्रम में। यही वह बिंदु है, जहां जमीर के मर जाने की असली पहचान होती है। जब सवाल पूछना बंद हो जाए, जब आंकड़े अनुभव से टकराएं और फिर भी उन्हें सच कहा जाए, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या सिर्फ़ आर्थिक नहीं, नैतिक भी है।
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यह कहानी किसी एक दल की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की है, जहां प्रतिनिधित्व धीरे-धीरे पेशा बन गया है और जनता सिर्फ़ आंकड़ों की पंक्ति। सवाल अब भी वही है—अगर आमदनी वाकई दोगुनी हो गई है, तो वह आम आदमी के घर तक क्यों नहीं पहुंची? और अगर नहीं पहुंची, तो फिर यह दावा किसके लिए और क्यों?








