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Degree Without Jobs: डिग्री है, नौकरी नहीं, शिक्षा नीति और युवा संकट

Degree Without Jobs:  आज भारत का युवा सिर्फ बेरोजगार नहीं है, वह दिशाहीन है। उसके हाथ में डिग्री है, लेकिन भविष्य नहीं। उसकी आँखों में मेहनत के सपने हैं, लेकिन सामने अवसरों का सन्नाटा। माता-पिता ने अपनी जरूरतें छोड़ीं, जमीन बेची, कर्ज लिया—ताकि बेटा-बेटी डॉक्टर बने, इंजीनियर बने, प्रोफेशनल बने। लेकिन आज वही एमबीबीएस, बीटेक, एमटेक, बीएड, एमएड पास युवा सिपाही, दरोगा और चतुर्थ श्रेणी की भर्तियों में लाइन लगाए खड़ा है
यह केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि नीतिगत असफलता का प्रमाण है।

सवाल यह नहीं कि युवा मेहनत नहीं कर रहा

सवाल यह है कि नीति उसे कहाँ ले जा रही है

शिक्षा और रोजगार के बीच टूटी हुई कड़ी

भारत में शिक्षा आज भी ऐसे चलाई जा रही है जैसे

  • बाजार स्थिर हो

  • उद्योग की जरूरतें न बदलती हों

  • और युवा सिर्फ डिग्री लेकर खुद रास्ता ढूंढ लेगा

हकीकत यह है कि जब किसी युवा ने इंजीनियरिंग या मेडिकल में दाखिला लिया था, तब उस क्षेत्र में अवसर थे। लेकिन पाँच-छह साल बाद जब वह पढ़कर निकला, तो नौकरी बाजार पूरी तरह बदल चुका था
नीति वहीं की वहीं खड़ी रही, युवा आगे निकल गया—और गिर गया।

इंटरमीडिएट के बाद अंधेरे में धकेला जाता युवा

सबसे बड़ा नीतिगत अपराध वहीं होता है,
जब इंटरमीडिएट के बाद युवा को खुद पर छोड़ दिया जाता है

आज 17–18 साल का छात्र यह तय कर रहा है कि वह अगले 40 साल क्या करेगा—
बिना किसी ठोस मार्गदर्शन के।

नीति में अनिवार्य काउंसलिंग क्यों नहीं?

सरकार को यह अनिवार्य करना होगा कि—

  • हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में प्रोफेशनल काउंसलिंग सेल हो

  • यह काउंसलिंग सिर्फ कोर्स बताने की औपचारिकता न हो

  • बल्कि उद्योग जगत की अगले पाँच साल की मांग के आधार पर हो

युवा को बताया जाए कि—

  • किन सेक्टर्स में नौकरियाँ बढ़ेंगी

  • किन क्षेत्रों में संतृप्ति आ चुकी है

  • उसकी रुचि, क्षमता और योग्यता किस दिशा में बेहतर परिणाम दे सकती है

यानी शिक्षा भीड़ देखकर नहीं, भविष्य देखकर चुनी जाए।

श्रेणीवार विभाजन और विशेषज्ञता की नीति

हर युवा डॉक्टर या इंजीनियर बने—यह न संभव है, न ज़रूरी।
नीति को यह स्वीकार करना होगा कि—

  • किसी को रिसर्च में जाना चाहिए

  • किसी को एप्लाइड स्किल में

  • किसी को टेक्नोलॉजी में

  • और किसी को मैनेजमेंट या सर्विस सेक्टर में

श्रेणीवार विभाजन करके, युवाओं को उनकी रुचि के अनुसार
विशेषज्ञता हासिल करने के लिए भेजना होगा

बिना इस रणनीति के हम सिर्फ डिग्रियों की भीड़ तैयार करते रहेंगे—
रोजगार नहीं।

कॉलेज खोलना समाधान नहीं, गुणवत्ता ज़रूरी है

आज नीति-निर्माताओं के लिए उपलब्धि का पैमाना यह हो गया है कि—

  • इतने मेडिकल कॉलेज खोल दिए

  • इतने इंजीनियरिंग कॉलेज बढ़ा दिए

लेकिन इससे शिक्षा का व्यवसायीकरण बढ़ा है, समाधान नहीं।

कम वेतन, अयोग्य शिक्षक और खोखली शिक्षा

जब कॉलेजों में—

  • शिक्षकों को सम्मानजनक वेतन नहीं मिलेगा

  • योग्य शिक्षक वहाँ टिकेंगे नहीं

  • अनुभवहीन लोग पढ़ाएँगे

तो सवाल सीधा है—
ऐसे शिक्षक छात्रों को क्या सिखाएँगे?

कमज़ोर शिक्षक, कमज़ोर छात्र तैयार करता है—
और कमज़ोर छात्र, बेरोजगार युवा बनता है।

नीति को यह स्वीकार करना होगा

सरकार को अब यह मानना होगा कि—

  • सिर्फ मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने से रोजगार नहीं आएगा

  • शिक्षा को इंडस्ट्री-लिंक्ड और स्किल-बेस्ड बनाना होगा

  • कॉलेजों को क्लासरूम नहीं, प्रोफेशनल ट्रेनिंग हब बनाना होगा

डिग्री के साथ काम करने की क्षमता देना ही असली सुधार है।

https://x.com/keithdorejel/status/2020927301605785794?s=20

युवा किससे सवाल पूछे?

आज का युवा पूछ रहा है—

  • शिक्षा व्यवस्था से?

  • सरकार की नीतियों से?

  • उद्योग जगत से?

  • या खुद से?

लेकिन असली सवाल नीति-निर्माताओं से है—
क्या आप युवाओं को भविष्य दे रहे हैं या सिर्फ डिग्रियाँ बाँट रहे हैं?

https://tesariaankh.com/politics-indian-politics-in-transition-bharatiya-rajniti-sankraman-janata-upakshit/

अगर समय रहते शिक्षा नीति नहीं बदली गई,
तो यह बेरोजगारी केवल आर्थिक संकट नहीं रहेगी—
यह सामाजिक असंतोष में बदलेगी।

और तब सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि
नौकरी कहाँ है,
बल्कि यह होगा कि
इस देश में मेहनत की कीमत क्यों नहीं है?

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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