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Indian Politics in Transition: संक्रमणकाल में भारतीय राजनीति और उपेक्षित होती जनता

Indian Politics in Transition: भारतीय राजनीति आज एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रही है जहाँ दिशा तो दिखती है, लेकिन गंतव्य का कोई भरोसा नहीं। सत्ता, विपक्ष और तथाकथित वैकल्पिक राजनीति—तीनों के भीतर एक अजीब-सी जड़ता और दिशाहीनता पसरी हुई है। ऐसा प्रतीत होता है मानो राजनीति अब जनसेवा का माध्यम नहीं, बल्कि आपसी शत्रुता, ईर्ष्या और स्वार्थ की प्रतियोगिता बन चुकी है। जो कुछ सकारात्मक किया जा सकता है, उसे भी इस भय से टाल दिया जाता है कि कहीं उसका श्रेय या लाभ किसी दूसरे को न मिल जाए। परिणामस्वरूप “कुछ न करना” ही सुरक्षित राजनीतिक रणनीति बन गई है।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक उपेक्षित यदि कोई है, तो वह है जनता—वही जनता जो लोकतंत्र की असली मालिक कही जाती है। विधानसभाओं और संसदों में जिन प्रतिनिधियों को जनता ने अपने मत से चुना, वे आज जनता की आवाज़ बनने के बजाय अपने निजी हितों, अपने समूहों और अपनी जेबों के प्रवक्ता अधिक दिखाई देते हैं। जनसमस्याएँ हाशिये पर हैं और व्यक्तिगत स्वार्थ केंद्र में। राजनीति का उद्देश्य अब समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाना, बदनाम करना और किसी भी तरह सत्ता समीकरण में बढ़त बनाना हो गया है।

Indian Politics in Transition: ये क्या हो रहा है

विडंबना यह है कि “फूट डालो और राज करो” की नीति, जो कभी विदेशी हुकूमत की पहचान थी, आज स्वदेशी राजनीति का अनकहा आदर्श बन चुकी है। जाति, धर्म, क्षेत्र और पहचान की दरारों को और गहरा कर सत्ता साधने की कोशिशें आम हो गई हैं। जनता की मजबूरियों, उसकी आर्थिक और सामाजिक असुरक्षाओं का बेजा लाभ उठाया जा रहा है। उसके सामने विकल्प सीमित हैं—चार गंदे विकल्पों में से एक को चुनने की मजबूरी। चुनाव के समय जो चेहरा मुस्कुराता है, जीत के बाद वही चेहरा सुरक्षा घेरों के पीछे ओझल हो जाता है।

आज का जनप्रतिनिधि अक्सर केवल नाम का जनप्रतिनिधि रह गया है। जनता से उसका वास्तविक संवाद टूट चुका है। वह न जनता के बीच सहजता से जाता है, न उनकी पीड़ा को प्रत्यक्ष सुनना चाहता है। सुरक्षा, प्रोटोकॉल और सत्ता का आवरण उसके और आम नागरिक के बीच एक लम्बी दूरी बना देता है। यह दूरी केवल भौतिक नहीं, मानसिक और संवेदनात्मक भी है।

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ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि संसदीय लोकतंत्र का भविष्य क्या होगा। क्या लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया तक सिमट कर रह जाएगा? क्या जनप्रतिनिधित्व का अर्थ केवल पाँच साल में एक बार वोट मांगने तक सीमित हो जाएगा? यदि राजनीति इसी राह पर आगे बढ़ती रही, तो लोकतंत्र का आत्मा-तत्व—जनभागीदारी, जवाबदेही और लोकहित—खोखला हो जाएगा।

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आज ज़रूरत है आत्ममंथन की—राजनीतिक दलों की भी और समाज की भी। जनता को फिर से केंद्र में लाने, राजनीति को सेवा और उत्तरदायित्व से जोड़ने तथा प्रतिनिधियों और नागरिकों के बीच टूटी कड़ी को पुनः जोड़ने की। अन्यथा यह संक्रमणकाल स्थायी बीमारी में बदल सकता है, जिसकी कीमत अंततः लोकतंत्र और देश दोनों को चुकानी पड़ेगी।

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Author: Tesari Aankh

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