Shankaracharya vs State: माघ मेले के पावन आयोजन के बीच उठे शंकराचार्य विवाद ने अब केवल प्रशासनिक टकराव नहीं रह गया है। यह मुद्दा राजनीति, धार्मिक आस्था और सोशल मीडिया पर चरम पर पहुंच चुका है। विवाद की शुरुआत स्थानीय प्रशासन और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच हुई टकराव से हुई थी, लेकिन इसका प्रभाव अब राष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिल रहा है।
विवाद की शुरुआत: संगम पर तकराव
माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या के स्नान के अवसर पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को संगम पर पलकी और भक्तों सहित स्नान करने की अनुमति नहीं दी गई। प्रशासन ने सुरक्षा कारणों और भीड़ के प्रबंधन का हवाला दिया, लेकिन इसके परिणाम में पुलिस-प्रशासन और संन्यासी समर्थकों के बीच धक्का-मुका भी हुआ। विवाद के बाद उन्हें धार्मिक पदवी की वैधता के आधार पर नोटिस जारी किया गया।
सोशल मीडिया पर इस घटना की वीडियो क्लिप्स और आरोप-प्रत्यारोप तेजी से वायरल हुए। एक ओर समर्थकों ने इसे सनातन धर्म के अपमान के रूप में पेश किया, वहीं आलोचकों ने इसे प्रोटोकॉल और कानून का मामला बताया।
सोशल मीडिया पर संग्राम — दो ध्रुव
सोशल प्लेटफॉर्म्स पर इस मुद्दे को लेकर दो मुख्य ध्रुव उभर रहे हैं:
🔹 सनातन समर्थक नेटवर्क
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कई यूज़र्स ने प्रशासन को सनातन धर्म के खिलाफ कदम उठाने का आरोप लगाया।
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ट्विटर/X और व्हाट्सएप ग्रुप्स पर हैशटैग जैसे #SanatanRespect, #ShankaracharyaProtect, और #RespectOurSeers तेजी से ट्रेंड हुए।
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पोस्टों में दावा किया गया कि शंकराचार्य का सम्मान न करना धार्मिक भावनाओं पर सीधा हमला है, और यह राज्य द्वारा आध्यात्मिक प्रतिष्ठानों की अवहेलना दर्शाता है।
🔹 विरोधी/तटस्थ रुझान
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कुछ सोशल मीडिया लेखों और टिप्पणियों ने प्रशासन को सुरक्षा और कानून का पालनकर्ता बताते हुए विवाद को धर्म-राजनीति का विभाजनकारी तत्व बताया।
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विशेषज्ञों ने यह भी तर्क प्रस्तुत किया कि सोशल मीडिया पर चल रही वेवजह टिप्पणियाँ असत्य सूचना भी फैला रही हैं, जिससे धर्म और कानून के बीच संतुलन का सवाल उठ रहा है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
बात अब राजनीति तक पहुँच चुकी है:
🗣️ कांग्रेस का तीखा हमला
उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रमुख अजय राय ने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ विरोध प्रदर्शन किया, और इसे सनातन का अपमान करार दिया। कांग्रेस ने प्रशासन पर धार्मिक आस्था को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगाया और उच्च स्तरीय जांच की मांग की।
🗣️ सपा का मोर्चा
समाजवादी पार्टी (सपा) ने भी पोस्टर्स और सोशल मीडिया पोस्टर के माध्यम से शंकराचार्य के समर्थन में अभियान चलाया और कहा कि “भारत शंकराचार्य का अपमान स्वीकार नहीं करेगा”.
🏛️ सरकार और अधिकारियों की प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विवाद के बीच धर्म-राष्ट्रीयता पर बयान देते हुए कहा कि कुछ लोग धर्म की आड़ में सनातन को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं—जिसका संदर्भ उन्होंने रामायण के कालनेमि प्रतीक से जोड़ा।
राज्य के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने विवाद को शांत करने का प्रयास करते हुए अविमुक्तेश्वरानंद को पूज्य शंकराचार्य कहकर संबोधित किया और कहा कि स्थिति को यहीं समाप्त करना चाहिए।
संत समुदाय में मतभेद
विवाद ने संत समाज को भी विभाजित किया है—
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कई पीठों और संतों ने मौजूदा घटना को धार्मिक मान-सम्मान का मुद्दा बताया।
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अन्य संतों ने इसे आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक समरसता का प्रश्न बनाते हुए विवाद से दूरी बनाए रखी।
इतना ही नहीं, उच्चतम संत परिषद के वरिष्ठ संतों ने कहा कि संतों का सम्मान समाज-परंपरा का हिस्सा है, लेकिन आदेशों/नियमन का पालन भी आवश्यक है।
सोशल मीडिया की भूमिका
सोशल प्लेटफॉर्म्स ने इस विवाद को तेज़ी से राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया है:
📌 रिएक्शन वीडियोज़ और क्लिप्स वायरल
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विरोधी-समर्थक दोनों ओर से वीडियोस, मीम्स और बयान साझा हो रहे हैं।
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कई पोस्ट ऐसे भी हैं, जिनमें विवाद को सनातन vs राज्य की विभेदक दिशा में प्रस्तुत किया जा रहा है।
📌 **फैक्ट चेक चुनौती
एक ही घटना के बारे में विभिन्न कथन फैलने से फैक्ट-चेकर्स ने चेतावनी दी है कि असत्य सूचनाएँ धार्मिक भावनाओं को भड़का सकती हैं और सामाजिक तनाव को बढ़ा सकती हैं।
शंकराचार्य विवाद अब केवल एक प्रशासनिक टकराव नहीं रह गया है—
यह सोशल मीडिया, राजनीति, धर्म और कानून के बीच एक जटिल संघर्ष में बदल चुका है। इस टकराव ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि धार्मिक प्रतिष्ठा और शासन-प्रक्रियाएँ कैसे संतुलित रहें? और साथ ही सोशल मीडिया पर किस हद तक प्रतिक्रियाएँ भरोसेमंद और जिम्मेदार हैं?
https://x.com/rautsanjay61/status/2014204313120453074?s=20
वर्तमान में यह मामला वाद-विवाद की सीमा से आगे निकलकर राष्ट्रीय चर्चाओं में शामिल हो गया है—जहाँ हर प्रतिक्रिया केवल जानकारी नहीं, बल्कि राय, भावना और पहचान का संग्राम बन चुकी है।








