प्रयागराज।
माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच टकराव अब किसी एक घटना या नोटिस तक सीमित नहीं रहा। यह विवाद तेजी से उस बुनियादी सवाल की ओर बढ़ रहा है—सनातन धर्म की मर्यादा और परंपरा तय करने का अधिकार किसके पास है: धर्माचार्यों के पास या राज्य सत्ता के पास?
मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान को लेकर शुरू हुआ विवाद, दूसरे नोटिस, स्थायी प्रतिबंध की चेतावनी और ज़मीन-अलॉटमेंट रद्द करने के अल्टीमेटम तक पहुँच चुका है। इसी बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मंत्रियों के तीखे बयान इस टकराव को और राजनीतिक-वैचारिक रंग दे रहे हैं।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में संगम स्नान के लिए जा रहे थे। पुलिस ने उन्हें पैदल चलने को कहा। शिष्यों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई, जिसके बाद शंकराचार्य ने अपने शिविर के बाहर धरना दिया।
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प्रशासन का आरोप है कि बैरिकेडिंग तोड़ी गई और भीड़ प्रबंधन को खतरे में डाला गया। शंकराचार्य पक्ष का दावा है कि अव्यवस्था जानबूझकर पैदा की गई और बाद में सारा दोष उन पर मढ़ दिया गया।
प्रशासन का सख्त कदम: सवाल सिर्फ व्यवस्था का या अधिकार का?
48 घंटे के भीतर दूसरा नोटिस जारी कर प्रशासन ने पूछा कि शंकराचार्य को माघ मेले से स्थायी रूप से प्रतिबंधित क्यों न किया जाए। साथ ही चेतावनी दी गई कि संतोषजनक जवाब न मिलने पर उनकी संस्था को दी गई ज़मीन और सुविधाएँ वापस ले ली जाएँगी।
यहीं से मामला प्रशासनिक अनुशासन से आगे बढ़कर धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य हस्तक्षेप के सवाल में बदल गया।
‘शंकराचार्य’ की पहचान पर सवाल क्यों अहम है?
प्रशासन ने शंकराचार्य के नामपट्ट और पद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कथित स्थगन का हवाला दिया। जवाब में अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि किसी प्रशासनिक अधिकारी को यह तय करने का अधिकार नहीं है कि शंकराचार्य कौन है और कौन नहीं।
धर्माचार्यों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब राज्य सत्ता धार्मिक पदों की वैधता पर टिप्पणी करती दिख रही है—और यही असली चिंता का विषय है।
योगी आदित्यनाथ का तल्ख रुख
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सीधे शंकराचार्य का नाम लिए बिना कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि “किसी को परंपराओं को बाधित करने का अधिकार नहीं है” और सनातन को कमजोर करने वालों को “कालनेमि” करार दिया।
उनका यह बयान सिर्फ कानून-व्यवस्था का संदेश नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे यह संकेत भी समझा जा रहा है कि सरकार सनातन की परिभाषा और अनुशासन अपने हाथ में रखना चाहती है।
मंत्री नंद गोपाल नंदी का बयान—“भगवान उन्हें सद्बुद्धि दें”—भी बताता है कि सरकार इस टकराव को धार्मिक अनुशासन बनाम अव्यवस्था के फ्रेम में देख रही है।
संत समाज क्यों बंट गया?
इस विवाद ने संत समाज में गहरी दरार उजागर कर दी है।
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द्वारका पीठ और रामानुजाचार्य ने प्रशासन से माफ़ी की मांग की।
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पुरी शंकराचार्य निश्छलानंद सरस्वती ने इसे धर्माचार्यों पर नियंत्रण की कोशिश बताया।
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वहीं कुछ संतों और अखाड़ा परिषद ने शंकराचार्य के आचरण पर सवाल उठाए।
यह विभाजन बताता है कि टकराव सिर्फ सरकार बनाम संत का नहीं, बल्कि सनातन की व्याख्या को लेकर आंतरिक संघर्ष का भी है।
असली सवाल क्या है?
यह विवाद अब इन सवालों पर टिक गया है:
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क्या राज्य सरकार खुद को सनातन परंपराओं का अंतिम संरक्षक मान रही है?
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क्या शंकराचार्य जैसे पद प्रशासनिक अनुमति पर निर्भर होंगे?
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क्या धार्मिक असहमति को ‘व्यवस्था भंग’ कहकर सीमित किया जाएगा?
प्रयागराज का यह टकराव एक संकेत है कि भविष्य में धर्म और सत्ता के रिश्ते और अधिक टकरावपूर्ण हो सकते हैं। योगी सरकार जिस सख्ती को अनुशासन मान रही है, शंकराचार्य और उनके समर्थक उसे धार्मिक स्वायत्तता पर हमला बता रहे हैं।
https://tesariaankh.com/shankaracharya-allegation-150-temples-demolished-varanasi/
फिलहाल सवाल खुला है—
सनातन का स्वर तय करेगा कौन: सत्ता या शास्त्र?








