Systematic targeting of Muslims in Uttarakhand: उत्तराखंड में बीते कुछ वर्षों के दौरान मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा, आर्थिक बहिष्कार, डराने-धमकाने और धार्मिक स्थलों पर सीधे हमलों की घटनाएँ किसी एक-दो घटनाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक सुनियोजित और व्यवस्थित पैटर्न का हिस्सा बन चुकी हैं। यह दावा नागरिक अधिकार संगठन एसोसिएशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स (APCR) की एक नई रिपोर्ट में किया गया है।
“Excluded, Targeted and Displaced: Communal Narratives and Violence in Uttarakhand” शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा को धीरे-धीरे राजनीति का “सामान्य औज़ार” बना दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, डर, झूठे ऐतिहासिक आख्यानों और प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल कर एक पूरे समुदाय को सार्वजनिक जीवन, रोज़गार और धार्मिक आचरण से बाहर धकेला जा रहा है।
‘ये महज़ संयोग नहीं हैं’
रिपोर्ट स्पष्ट शब्दों में कहती है कि उत्तराखंड में मुसलमानों के पलायन, दुकानों के बंद होने या धार्मिक स्थलों के ध्वस्तीकरण को महज़ प्रशासनिक कार्रवाई या आपसी गलतफहमी नहीं कहा जा सकता।
“दुकानदार किसी भ्रम के कारण शहर नहीं छोड़ते, परिवार संयोग से राज्य की सीमाओं के आर-पार नहीं बँटते और सदियों पुराने धार्मिक स्थल किसी तटस्थ प्रक्रिया के तहत एक साथ नहीं गिराए जाते। ये सभी घटनाएँ एक साझा रणनीति से जुड़ी हैं,” रिपोर्ट में कहा गया है।
2021 के बाद तेज़ हुई सांप्रदायिक हिंसा
APCR के अनुसार, उत्तराखंड में सांप्रदायिक तनाव 2021 के बाद तेज़ी से बढ़ा। हरिद्वार में आयोजित धर्म संसद में कुछ हिंदुत्ववादी धार्मिक नेताओं द्वारा मुसलमानों के ख़िलाफ़ खुले तौर पर हिंसा और नरसंहार की कथित अपीलों को रिपोर्ट ने एक अहम मोड़ बताया है।
https://x.com/MuslimSpaces/status/2013924520177115470?s=20
रिपोर्ट में यति नरसिंहानंद, प्रबोधनंद गिरी, यतिंद्रानंद गिरी, साध्वी अन्नपूर्णा, स्वामी आनंद स्वरूप और कालीचरण महाराज जैसे नामों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इन भाषणों ने ज़मीन पर हिंसा को वैचारिक आधार दिया।
पुरोला से शुरू हुआ डर का सिलसिला
रिपोर्ट के मुताबिक़ 2023 में पुरोला (उत्तरकाशी) की घटना के बाद हालात और बिगड़े। “लव जिहाद” के झूठे आरोपों के बाद मुसलमानों पर हमले हुए और कई परिवारों को शहर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। APCR का कहना है कि यह सब उस समय हुआ जब इन घटनाओं पर राष्ट्रीय मीडिया की नज़र सीमित रही।
इसके बाद यही पैटर्न उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, गौचर और गैरसैंण जैसे इलाकों में फैलता चला गया।
दुकानों पर हमले, बेदखली और बहिष्कार
रिपोर्ट में कई हालिया घटनाओं का ज़िक्र किया गया है, जिनमें शामिल हैं:
-
उत्तरकाशी में मस्जिद को लेकर तनाव
-
टिहरी के कीर्ति नगर और चौरास में “लव जिहाद” के आरोपों पर मुस्लिम दुकानदारों की बेदखली
-
नंदा घाट में कथित छेड़छाड़ की घटना के बाद 15 दुकानों में तोड़फोड़ और लूट
-
गौचर में पार्किंग विवाद के बाद 10 मुस्लिम दुकानदारों को हटाना
-
गैरसैंण में 2024 में एक व्यापार मंडल का अल्टीमेटम, जिसमें मुसलमानों को 31 दिसंबर तक इलाक़ा छोड़ने को कहा गया
चमोली में मुस्लिम दुकानों में तोड़फोड़ के बाद पुलिस ने 500 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमे दर्ज किए, लेकिन रिपोर्ट सवाल उठाती है कि वास्तविक दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
‘बाहरी’ बताकर निशाना
रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित मुसलमानों में से कई परिवार 1970 और 1980 के दशक में उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद से उत्तराखंड आए थे और राज्य गठन (2000) से बहुत पहले से यहाँ रह रहे हैं। इसके बावजूद अब उन्हें “बाहरी” बताकर निशाना बनाया जा रहा है।
सरकार और प्रशासन की भूमिका पर सवाल
APCR रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने “लैंड जिहाद”, “मजार जिहाद” और “थूक जिहाद” जैसे अभियानों को बढ़ावा दिया। रिपोर्ट के मुताबिक़ मई 2024 तक लगभग 5,000 एकड़ ज़मीन “रिकवर” किए जाने के दावे किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया।
पुrola घटना के बाद “लव जिहाद” के नाम पर पृष्ठभूमि जाँच के आदेश और 2023 की हिंदुत्व महापंचायत के बाद हालात इतने बिगड़े कि उत्तराखंड हाई कोर्ट को शांति बनाए रखने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा।
क़ानूनों के ज़रिए हाशिये पर धकेलने का आरोप
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ क़ानूनों का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को और कमज़ोर करने के लिए किया जा रहा है, जिनमें शामिल हैं:
-
Uniform Civil Code Act, 2024
-
धर्मांतरण विरोधी क़ानून में संशोधन
-
Minority Educational Institution Bill
APCR का कहना है कि UCC क़ानून मुस्लिम और ईसाई समुदायों के व्यक्तिगत क़ानूनों—शादी, तलाक़, विरासत और गोद लेने—को प्रभावित करता है, जिससे सांस्कृतिक पहचान के क्षरण का डर पैदा हुआ है।
‘डर को रोज़मर्रा की ज़िंदगी बना दिया गया’
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि अफ़वाहें, चुनिंदा क़ानूनी कार्रवाई, प्रशासनिक समन्वय और तथाकथित नागरिक आंदोलनों के ज़रिए ऐसा माहौल बनाया गया है जिसमें एक मुस्लिम दुकानदार को यह भरोसा नहीं रहता कि वह कल अपनी दुकान खोल पाएगा या नहीं, और एक परिवार यह सुनिश्चित नहीं कर सकता कि उसका धार्मिक स्थल अगले साल भी मौजूद रहेगा।
https://tesariaankh.com/job-education-furteela-kintu-santulit-vyakti-upsc-nibandh/
APCR ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते हस्तक्षेप नहीं हुआ तो उत्तराखंड की सामाजिक बनावट को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।








