Shankaracharya Avimukteshwaranand: “150 मंदिर तोड़े गए”: क्या ये आरोप नहीं सत्ता के अहंकार को चुनौती है
Shankaracharya Avimukteshwaranand: जब हिन्दुत्व की वैचारिक भूमि पर खड़े होकर कोई सत्ता से सवाल करे, तो उसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। लेकिन जब यह सवाल हिन्दू धर्म की सर्वोच्च दार्शनिक परंपरा—शंकराचार्य परंपरा से आए, तब वह केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं रह जाता, बल्कि आत्ममंथन की चुनौती बन जाता है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने यह आरोप लगाकर कि
“इस सरकार ने काशी में लगभग 150 मंदिर तुड़वा दिए, जिनमें कई 600, 800甚至 1000 वर्ष पुराने थे,”
एक ऐसी बहस छेड़ दी है, जो अब केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रही।
आरोप क्यों असाधारण हैं?
ये आरोप इसलिए भी असाधारण हैं क्योंकि:
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ये किसी विपक्षी नेता ने नहीं
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किसी सेक्युलर बुद्धिजीवी ने नहीं
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बल्कि चार में से दो शंकराचार्य पीठों में से एक पर आसीन शंकराचार्य ने लगाए हैं
और आरोप उस सरकार पर है जो स्वयं को हिन्दुत्व की संरक्षक बताती है।
यह सीधा प्रश्न खड़ा करता है—
क्या विकास के नाम पर मंदिर तोड़ना भी हिन्दुत्व है?
काशी का प्रबुद्ध वर्ग क्या कहता है?
📿 संस्कृत विद्वान और धर्माचार्य
काशी के एक वरिष्ठ संस्कृत आचार्य कहते हैं:
“काशी में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, वे समय की परतें हैं। यदि कोई 800 साल पुराना मंदिर हटाया गया, तो वह केवल पत्थर नहीं, परंपरा का विस्मरण है।”
कई संतों का मत है कि मंदिरों का स्थानांतरण या ध्वस्तीकरण सनातन परंपरा में अत्यंत संवेदनशील विषय है, जिसे केवल प्रशासनिक आदेश से नहीं निपटाया जा सकता।
इतिहासकार और विरासत विशेषज्ञ
काशी के इतिहास पर काम करने वाले एक शोधकर्ता बताते हैं:
“काशी में हजारों सूक्ष्म मंदिर थे—घर के कोनों में, गलियों के मोड़ों पर, घाटों के पास। ये ASI सूची में नहीं थे, लेकिन लोक-आस्था में जीवित थे।”
उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं के दौरान ‘गैर-प्रमुख’ मंदिर सबसे पहले बलि चढ़ते हैं, क्योंकि उनका कोई सरकारी रिकॉर्ड नहीं होता।
https://tesariaankh.com/manikarnika-ghat-renovation-heritage-vs-development/
सामाजिक चिंतक
काशी के एक प्रबुद्ध सामाजिक विश्लेषक कहते हैं:
“यह पहली बार है जब हिन्दुत्व की आलोचना हिन्दू धर्म की सर्वोच्च परंपरा के भीतर से आ रही है। इसे नज़रअंदाज़ करना आत्मघाती होगा।”
उनके अनुसार, यदि हिन्दुत्व सत्ता-केंद्रित हो जाए और सनातन धर्म स्मृति-केंद्रित रहे, तो टकराव अपरिहार्य है।
समर्थक और विरोधी—दो धाराएँ
🔹 सरकार समर्थक वर्ग का तर्क:
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कोई भी मंदिर ‘संरक्षित सूची’ में नहीं था
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मूर्तियों को सुरक्षित स्थानांतरित किया गया
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विकास के बिना काशी अव्यवस्थित हो जाती
🔹 आलोचक वर्ग का सवाल:
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क्या हर आस्था सरकारी सूची में दर्ज होती है?
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क्या मंदिर केवल संरक्षित स्मारक होते हैं?
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क्या हिन्दुत्व का अर्थ केवल भव्य निर्माण है, संरक्षण नहीं?
शंकराचार्य बनाम सत्ता: केवल आरोप नहीं, वैचारिक टकराव
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पहले भी:
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गंगा की अविरलता
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चारधाम परियोजना
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सनातन परंपरा के बाज़ारीकरण
पर सरकार की आलोचना कर चुके हैं।
उनका यह ताज़ा बयान संकेत देता है कि हिन्दुत्व और सनातन धर्म के बीच की खाई अब खुलकर सामने आ रही है।
https://x.com/mr_mayank/status/2011750069138309450?s=20
काशी केवल प्रतीक नहीं, परीक्षा है
काशी में मंदिर टूटने का सवाल केवल संख्या का नहीं है।
यह सवाल है—
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स्मृति का
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निरंतरता का
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और उस दावे का कि कौन सनातन का वास्तविक वाहक है
शंकराचार्य के आरोपों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि
हिन्दुत्व की सबसे कठिन परीक्षा काशी में ही होगी।
काशी का पांडित्य, काशी का फक्कड़पन और काशी का विरोध इतिहास क्या बताता है?
काशी को यदि केवल तीर्थ, मंदिर या घाटों तक सीमित कर दिया जाए, तो यह उसके साथ अन्याय होगा। काशी ज्ञान, असहमति और निर्लिप्तता—तीनों की एक साथ उपस्थिति का नाम है। इतिहास बताता है कि काशी कभी सत्ता की गोद में नहीं बैठी, न ही उसने सत्ता को पूरी तरह नकारा। उसने हमेशा अपनी शर्तों पर जीना चुना।
काशी का पांडित्य: प्रश्न पूछने की परंपरा
काशी का पांडित्य रटंत नहीं रहा।
यह तर्क, शास्त्रार्थ और संशय से पैदा हुआ पांडित्य है।
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उपनिषदों की रचना स्थलों में काशी प्रमुख रही
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आदि शंकराचार्य ने यहाँ आकर मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ किया
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बौद्ध, जैन, शैव, वैष्णव—सभी धाराओं ने यहाँ बहस की, टकराए और सह-अस्तित्व में रहे
काशी में विद्वान वह नहीं माना गया जो उत्तर दे,
बल्कि वह जो प्रश्न को जीवित रखे।
इसीलिए काशी का पांडित्य सत्ता-समर्थक कम और
सत्ता-संशयवादी अधिक रहा।
काशी का फक्कड़पन: निर्भय स्वतंत्रता
काशी का फक्कड़पन उसका सबसे गलत समझा गया गुण है।
यह लापरवाही नहीं, बल्कि निर्भय निर्लिप्तता है।
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कबीर जुलाहा थे, लेकिन ब्राह्मणवाद और मुल्लावाद—दोनों को ललकारा
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रैदास चर्मकार थे, पर संतों में शिखर पर बैठे
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तुलसीदास ने राम को लोक में उतारा, राजदरबार में नहीं बाँधा
फक्कड़ काशी वह है जो कहती है—
“ना राजा से डर है, ना विद्वान होने का घमंड।”
इसीलिए यहाँ साधु राजा को डाँट सकता है,
और पंडित फटे वस्त्रों में भी सम्मान पा सकता है।
काशी का विरोध: असहमति की जड़ें
काशी का विरोध नारा नहीं, संस्कार है।
इतिहास बताता है:
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मुग़ल काल में काशी ने मंदिर टूटने के बावजूद भक्ति नहीं छोड़ी
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अंग्रेज़ी राज में यहीं से धार्मिक-सांस्कृतिक पुनर्जागरण हुआ
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आज़ादी के बाद भी काशी सत्ता के हर रूप से प्रश्न करती रही
काशी का विरोध कभी क्रांति की तरह उग्र नहीं रहा,
लेकिन वह लगातार, अडिग और नैतिक रहा।
यह विरोध तलवार से नहीं,
कथन, कीर्तन और कटाक्ष से होता रहा।
तीनों का संगम: क्यों काशी खतरनाक है?
सत्ता के लिए काशी इसलिए असहज रही क्योंकि यहाँ—
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पांडित्य सवाल करता है
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फक्कड़पन डरता नहीं
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विरोध झुकता नहीं
इतिहास बताता है कि जब-जब किसी सत्ता ने काशी को
सिर्फ धार्मिक प्रतीक या पर्यटन स्थल बनाना चाहा,
काशी ने किसी न किसी रूप में असहमति दर्ज कराई।
आज की काशी: परंपरा बनाम प्रोजेक्ट
आज जब काशी को:
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कॉरिडोर में बदला जा रहा है
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विरासत को ‘रीडेवलपमेंट’ कहा जा रहा है
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विरोध को ‘अवरोध’ बताया जा रहा है
तो इतिहास की स्मृति चेतावनी देती है—
👉 काशी मौन रह सकती है
👉 लेकिन वह आत्मसमर्पण नहीं करती
काशी क्या सिखाती है?
इतिहास कहता है—
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काशी ज्ञान सिखाती है, लेकिन अहंकार नहीं
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काशी भक्ति सिखाती है, लेकिन अंधत्व नहीं
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काशी विरोध सिखाती है, लेकिन घृणा नहीं
इसलिए काशी को बदला जा सकता है,
लेकिन उसका स्वभाव नहीं बदला जा सकता।
और शायद यही कारण है कि
हर सत्ता अंततः काशी से डरती है।








