US Threatens Iran Again Amid Protests: सड़कों पर उतरे लोग और युद्ध की आग
वॉशिंगटन/तेहरान।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ईरान पर सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं। इस बार दावा यह है कि हमला ईरान के सत्तारूढ़ कट्टरपंथी शासन के खिलाफ सड़कों पर उतरे लाखों आम नागरिकों के समर्थन में होगा। लेकिन सवाल यह है—क्या बम लोकतंत्र ला सकते हैं? और क्या “मदद” के नाम पर किया गया हमला उन्हीं लोगों को लहूलुहान नहीं कर देगा, जिनके नाम पर यह किया जा रहा है?
सीएनएन के वरिष्ठ सैन्य विश्लेषक ब्रेड लेंडन के अनुसार, यदि अमेरिका ने ईरान पर दोबारा हमला किया तो यह पिछले साल के सीमित परमाणु ठिकानों पर किए गए हमलों जैसा नहीं होगा। तब बी-2 स्टील्थ बॉम्बर्स ने बिना किसी अमेरिकी नुकसान के ईरान के तीन परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया था। लेकिन इस बार लक्ष्य कहीं अधिक जटिल, खतरनाक और मानवीय रूप से संवेदनशील होंगे।
सड़कों पर जनता, बंदूकों के पीछे आईआरजीसी
ईरान में विरोध प्रदर्शनों को कुचलने का काम मुख्य रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC), उसकी अर्धसैनिक शाखा बसीज, और पुलिस कर रही है। विश्लेषकों के अनुसार, यदि अमेरिका वास्तव में प्रदर्शनकारियों के समर्थन में कार्रवाई करता है तो उसे इन्हीं संस्थानों के कमांड सेंटरों, मुख्यालयों और आर्थिक ठिकानों को निशाना बनाना होगा।
लेकिन यही सबसे बड़ा खतरा है। ब्रेड लेंडन के हवाले से पूर्व अमेरिकी नौसेना अधिकारी कार्ल शूस्टर चेतावनी देते हैं—“अगर किसी भी हमले में, चाहे अनजाने में ही सही, आम नागरिक मारे गए तो अमेरिका एक मुक्तिदाता नहीं बल्कि एक विदेशी दमनकारी शक्ति के रूप में देखा जाएगा।” ईरान के कई सुरक्षा मुख्यालय घनी आबादी वाले इलाकों में स्थित हैं। ऐसे में मिसाइल या ड्रोन हमला बच्चों, महिलाओं और उन युवाओं की जान ले सकता है जो खुद शासन के खिलाफ सड़कों पर हैं।
युद्ध का उलटा असर: शासन को मिल सकता है नया हथियार
इतिहास गवाह है कि बाहरी हमला अक्सर तानाशाही शासन को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत करता है। यदि अमेरिकी बमों से आम ईरानी नागरिकों की मौत होती है, तो तेहरान का शासन इसे प्रचार के हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगा—“देखो, अमेरिका हमारे देश को बर्बाद करना चाहता है।” ऐसी स्थिति में वे नागरिक भी, जो सुधार चाहते हैं, राष्ट्रीय अस्मिता के नाम पर सत्ता के साथ खड़े हो सकते हैं। यही वह मोड़ होगा, जहां अमेरिका की रणनीति खुद उसके मकसद को विफल कर देगी।
क्या-क्या हो सकते हैं अमेरिका के निशाने पर?
सीएनएन के विश्लेषण के अनुसार अमेरिका के पास कई विकल्प हैं:
ईरान के शीर्ष नेता
सीधे हत्या मुश्किल है, लेकिन उनके घरों, दफ्तरों या सुरक्षित ठिकानों पर हमला एक मनोवैज्ञानिक संदेश हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका सैन्य लाभ कम, प्रतीकात्मक असर ज्यादा होगा।
आईआरजीसी की आर्थिक रीढ़
ऑस्ट्रेलियाई सरकारी आकलन के मुताबिक, ईरान की GDP का 60–65% हिस्सा आईआरजीसी नियंत्रित करती है। तेल, निर्माण, बंदरगाह, बैंकिंग—हर जगह उसकी पकड़ है। इन व्यावसायिक ठिकानों पर हमला सीधे सत्ता के “पर्स” पर वार होगा।
तेल ठिकाने: सबसे आसान, सबसे खतरनाक
ब्रेड लेंडन के अनुसार, तेल प्रतिष्ठानों पर हमला अमेरिका के लिए सबसे आसान और नाटकीय विकल्प हो सकता है। आसमान में उठते काले धुएं, जलते रिफाइनरी टैंक—टीवी कैमरों के लिए दृश्य भले ही प्रभावशाली हों, लेकिन इसके परिणाम होंगे विनाशकारी। तेल ठप हुआ तो ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी, आम जनता पर महंगाई और बेरोजगारी की मार पड़ेगी इससे पूरा पश्चिम एशिया अस्थिर हो सकता है
https://x.com/Mar364503/status/2011643412194476435?s=20
मिसाइलें, ड्रोन और दूर बैठा युद्ध
विशेषज्ञों के मुताबिक इस बार अमेरिका शायद टोमहॉक क्रूज मिसाइलें (पनडुब्बियों और युद्धपोतों से), JASSM स्टैंडऑफ मिसाइलें, ड्रोन हमले का इस्तेमाल करे।
कम जोखिम, दूर से हमला—लेकिन जमीन पर तबाही उतनी ही वास्तविक होगी।
युद्ध का ‘थिएटर’ और इंसानी चीखें
ब्रेड लेंडन लिखते हैं कि ट्रंप प्रशासन को नाटकीय सैन्य कार्रवाई पसंद है—तेज़, सीमित और मीडिया-फ्रेंडली। लेकिन युद्ध कोई फिल्म नहीं। हर मिसाइल के साथ किसी मां की चीख, किसी बच्चे का अधूरा भविष्य, किसी शहर का खामोश मलबा जुड़ा होता है।
https://tesariaankh.com/shaksgam-valley-india-china-border-dispute/
बमों से आज़ादी नहीं आती
ईरान की सड़कों पर उतरी जनता बदलाव चाहती है, लेकिन विदेशी बमबारी नहीं। यदि अमेरिका वास्तव में उनके साथ खड़ा होना चाहता है, तो उसे यह समझना होगा कि—युद्ध सत्ता को नहीं, सबसे पहले इंसानियत को मारता है।और कभी-कभी, सबसे बड़ा हमला वही होता है जो किया ही न जाए।








