Illegal religious encroachment in UP: उत्तर प्रदेश में अवैध धार्मिक अतिक्रमण पर कार्रवाई: ताज़ा आंकड़े क्या संकेत देते हैं?
उत्तर प्रदेश में अवैध धार्मिक संरचनाओं, मदरसों, मस्जिदों, मजारों और अन्य अतिक्रमणों के खिलाफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चलाया जा रहा अभियान अब किसी एक समयबद्ध कार्रवाई तक सीमित नहीं रह गया है। बल्कि, यह साफ तौर पर एक निरंतर प्रशासनिक नीति का रूप ले चुका है, जो मई 2025 से आगे बढ़ते हुए जनवरी 2026 तक भी जारी है। पिछले वर्ष मई 2025 में नेपाल सीमा से सटे जिलों में सैकड़ों अवैध धार्मिक ढांचों को हटाए जाने की कार्रवाई हुई थी। हालांकि, ताज़ा घटनाएं यह स्पष्ट करती हैं कि यह अभियान सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि भौगोलिक रूप से फैलते हुए नए क्षेत्रों तक पहुंच चुका है।
संभल में ताज़ा कार्रवाई: अभियान का विस्तार
इसी क्रम में, जनवरी 2026 की शुरुआत में संभल जिले में हुई कार्रवाई को एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है। यहां सरकारी भूमि पर बने दो मस्जिदों और एक मदरसे को प्रशासन ने ध्वस्त किया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान ड्रोन निगरानी, वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी और पर्याप्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे। दिलचस्प बात यह रही कि, कुछ स्थानों पर स्थानीय समुदाय के लोगों ने स्वयं ही ढांचे हटाने की पहल कर दी। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकारी कार्रवाई का मनोवैज्ञानिक प्रभाव पहले ही ज़मीन पर दिखने लगा है और कई मामलों में लोग संभावित कानूनी कार्रवाई से पहले ही पीछे हट रहे हैं।
मई 2025 तक का डेटा क्या कहता है?
यदि पीछे देखें, तो मई 2025 तक सरकारी आंकड़ों में यह सामने आया था कि नेपाल सीमा से सटे जिलों—जैसे श्रावस्ती, बहराइच, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज, लखीमपुर खीरी और पीलीभीत—में 350 से अधिक अवैध धार्मिक ढांचों को सील या ध्वस्त किया जा चुका था। इसके अलावा, प्रशासन ने कई मामलों में सीधे बुलडोजर कार्रवाई करने के बजाय पहले नोटिस जारी किए, अवैध निर्माणों की पहचान की और फिर कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद कार्रवाई की। इसका उद्देश्य साफ था—विवाद और टकराव की संभावना को न्यूनतम रखना।
ताज़ा घटनाओं से क्या निष्कर्ष निकलता है?
इन नए और पुराने दोनों तरह के आंकड़ों को एक साथ देखें, तो कुछ बातें साफ-साफ उभरकर सामने आती हैं—पहली, यह अभियान सीमा क्षेत्रों में सरकारी भूमि और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा को केंद्र में रखकर चलाया जा रहा है। दूसरी, यह स्पष्ट है कि कार्रवाई केवल मई 2025 तक सीमित नहीं रही, बल्कि जनवरी 2026 तक भी सक्रिय रूप से जारी है। तीसरी, अब प्रशासन सिर्फ संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि संवेदनशील जिलों में निगरानी-आधारित, चरणबद्ध कार्रवाई कर रहा है।और अंततः, नोटिस, सीलिंग और ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया अब अधिक निर्णायक और संस्थागत रूप ले चुकी है।

नीति के स्तर पर योगी सरकार का संदेश
इस पूरे अभियान का सबसे अहम पहलू यह है कि सरकार एक बुनियादी सिद्धांत को बार-बार स्पष्ट कर रही है—
कोई भी स्थायी निर्माण तब तक वैध नहीं है, जब तक उसके लिए सभी आवश्यक सरकारी अनुमतियां मौजूद न हों।
https://x.com/myogioffice/status/2007626212823519555?s=20
विशेष रूप से सीमावर्ती इलाकों में लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि अवैध संरचनाएं वहां क्यों और कैसे उभरती हैं। इस अभियान के जरिए, सरकार यह संदेश दे रही है कि नियमों का पालन सभी के लिए अनिवार्य है, सरकारी और सार्वजनिक भूमि पर कब्जे को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा, और नियमों का उल्लंघन धार्मिक या सामाजिक पहचान के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। इसी कारण, यह कार्रवाई केवल भूमि प्रशासन की नहीं, बल्कि आंतरिक सुरक्षा और शासन-व्यवस्था को मजबूत करने की नीति के रूप में भी देखी जा रही है।
अंततः, ताज़ा और पुराने दोनों आंकड़े मिलकर यह स्पष्ट करते हैं कि उत्तर प्रदेश में अवैध धार्मिक अतिक्रमण के खिलाफ अभियान एक बार की कार्रवाई नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया बन चुका है। अब यह अभियान न केवल अवैध ढांचों को हटाने तक सीमित है, बल्कि निगरानी, संवेदनशीलता और स्थानीय प्रशासन के समन्वय के साथ आगे बढ़ रहा है।
सरकार का रुख साफ है—
अतिक्रमण किसी भी परिस्थिति में कानूनी अधिकार नहीं है, और कोई भी व्यक्ति या समूह सरकारी भूमि पर कब्जा करके नियमों के विरुद्ध वैधता का दावा नहीं कर सकता।
https://tesariaankh.com/encroachment-not-a-right-democracy-public-order-india/
यह अभियान दरअसल उसी बुनियादी सिद्धांत को दोहराता है, जिस पर कोई भी लोकतांत्रिक शासन टिका होता है—कानून सबके लिए समान है, और सार्वजनिक भूमि निजी सुविधा का साधन नहीं हो सकती।








