Bangladesh Violence: चारसिंदूर बाजार की वह छोटी किराने की दुकान अब बंद है। लकड़ी के शटर पर जमी धूल, खून के धब्बों की गवाही देती है। 40 वर्षीय सरत चक्रवर्ती मणि अब इस दुनिया में नहीं हैं। कुछ ही घंटों बाद, जशोर के कपालिया बाजार में बर्फ की फैक्ट्री के बाहर 38 वर्षीय राणा प्रताप बैरागी को बेहद नजदीक से गोली मार दी गई। दो ज़िंदगियाँ, दो परिवार—और 24 घंटे में टूटता भरोसा।
ये घटनाएँ अलग-थलग नहीं हैं। बीते हफ्तों में शरियतपुर, मयमनसिंह और अन्य जिलों से भीड़ हिंसा, लक्षित हत्याओं और ईशनिंदा के झूठे आरोपों पर मौत की खबरें आईं। सवाल यह नहीं कि क्या हो रहा है, सवाल यह है कि क्यों हो रहा है—और कौन जिम्मेदार है?
डर की जड़ें: कट्टरता, दंडहीनता और राजनीतिक अस्थिरता
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा की पृष्ठभूमि बहुस्तरीय है।
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कट्टरपंथी तत्वों का उभार: सामाजिक-धार्मिक ध्रुवीकरण ने हिंसा को वैचारिक औचित्य देने की कोशिश की है।
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दंडहीनता का माहौल: हमले होते हैं, जांचें चलती हैं—पर सज़ा कम दिखती है। यही संदेश जाता है कि अपराध सस्ता है।
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राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता संघर्ष: कमजोर संस्थागत नियंत्रण में भीड़ और हथियारबंद समूह ताकतवर हो जाते हैं।
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सूचना-युद्ध और अफवाहें: ईशनिंदा जैसे आरोपों पर त्वरित, क्रूर हिंसा यह बताती है कि कानून पीछे छूट जाता है।
पीड़ितों का मानवीय पक्ष
सरत की दुकान केवल रोज़गार नहीं थी—वह पड़ोस का भरोसा थी। राणा प्रताप बैरागी केवल कारोबारी नहीं थे—वे पत्रकार थे, जो स्थानीय सच लिखते थे। जब आवाज़ें चुप कराई जाती हैं, तो डर केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं रहता; वह पूरे समाज को घेर लेता है।
https://x.com/LogicalIndians/status/2008414400986968414?s=20
भारत की भूमिका: नैतिक आवाज़ और रणनीतिक संकोच
भारत, क्षेत्रीय शक्ति होने के नाते, केवल दर्शक नहीं हो सकता। लेकिन यहाँ मौजूदा नेतृत्व की कुछ खामियाँ स्पष्ट दिखती हैं:
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सार्वजनिक कूटनीति की कमी
बयान आते हैं, पर वे अक्सर मंद और प्रतिक्रियात्मक होते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर निरंतर, स्पष्ट और मानवाधिकार-आधारित दबाव कम दिखता है। -
रणनीतिक संतुलन का बोझ
सुरक्षा, व्यापार और भू-राजनीति की मजबूरियाँ वास्तविक हैं, पर मानवाधिकार की कीमत पर चुप्पी भारत की नैतिक साख को कमजोर करती है। -
बहुपक्षीय मंचों का अपर्याप्त उपयोग
संयुक्त राष्ट्र, कॉमनवेल्थ और अन्य मंचों पर संस्थागत निगरानी, विशेष दूत, या स्वतंत्र जांच की मांग अधिक सशक्त ढंग से उठाई जा सकती थी। -
शरणार्थी और मानवीय नीति की अस्पष्टता
हिंसा बढ़ने पर सीमावर्ती मानवीय संकट की तैयारी और स्पष्ट नीति का अभाव चिंता बढ़ाता है। -
डायस्पोरा और सिविल सोसायटी के साथ समन्वय की कमी
अंतरराष्ट्रीय जनमत निर्माण में नागरिक समाज, मीडिया और प्रवासी समुदायों की भूमिका को रणनीतिक रूप से जोड़ा नहीं गया।
आगे का रास्ता: केवल निंदा नहीं, ठोस कदम
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निरंतर कूटनीतिक दबाव: समयबद्ध जांच, अभियोजन और दोषियों को सज़ा की मांग।
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बहुपक्षीय निगरानी: स्वतंत्र पर्यवेक्षकों और मानवाधिकार तंत्र की सक्रियता।
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मानवीय सहायता और संरक्षण: जोखिमग्रस्त समुदायों के लिए सुरक्षा सहयोग।
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सूचना-युद्ध से मुकाबला: अफवाहों के विरुद्ध तथ्य, डिजिटल साक्षरता और त्वरित प्रतिक्रिया।
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नैतिक नेतृत्व: भारत की आवाज़ स्पष्ट हो—धर्म के आधार पर हिंसा अस्वीकार्य है।
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बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ती हिंसा केवल एक देश का आंतरिक मामला नहीं—यह मानवाधिकार का प्रश्न है। खामोशी अपराध को बढ़ावा देती है। भारत के लिए यह समय है कि वह रणनीतिक चुप्पी से आगे बढ़कर नैतिक स्पष्टता दिखाए। क्योंकि जब पड़ोस में खून बहता है, तो उसकी छींटें अंततः हमारी सीमा तक भी आती हैं।








