Pakistan US lobbying: पाकिस्तान कई मोर्चों पर गंभीर दबावों का सामना
Pakistan US lobbying: पाकिस्तान इस समय एक साथ कई मोर्चों पर गंभीर दबावों का सामना कर रहा है। एक ओर वह अमेरिका में अपनी छवि सुधारने और रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए आक्रामक लॉबिंग और जनसंपर्क अभियानों पर लाखों डॉलर खर्च कर रहा है, वहीं दूसरी ओर देश के भीतर मानवाधिकार उल्लंघन, जबरन गुमशुदगी और बढ़ती आतंकी हिंसा के आरोप लगातार गहराते जा रहे हैं।
अमेरिकी फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) के तहत सामने आए दस्तावेज पाकिस्तान की उस कूटनीतिक कोशिश को उजागर करते हैं, जिसके जरिए वह अमेरिकी कांग्रेस, प्रशासन, थिंक टैंकों और मीडिया को प्रभावित करना चाहता है। इसी बीच सिंध में सिंधी राजनीतिक कार्यकर्ताओं की जबरन गुमशुदगी और खैबर पख्तूनख्वा में बिगड़ती सुरक्षा स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों से हस्तक्षेप की मांग तेज हो गई है।
पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट और स्थानीय राजनीतिक नेताओं के बयान यह संकेत देते हैं कि आतंकी गतिविधियां, राज्य दमन और लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश देश के भीतर अस्थिरता को और बढ़ा रहे हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की लॉबिंग और जमीनी सच्चाइयों के बीच बढ़ता विरोधाभास वैश्विक चिंता का विषय बनता जा रहा है।
पाकिस्तान ने तेज की अमेरिका में अपनी लॉबिंग और जनसंपर्क गतिविधियां
अमेरिकी फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत दाखिल दस्तावेजों से पता चलता है कि पाकिस्तान ने अमेरिका में अपनी लॉबिंग और जनसंपर्क गतिविधियां तेज कर दी हैं। इन दस्तावेजों में बताया गया है कि पाकिस्तान सरकार और उससे जुड़े संगठनों ने अमेरिका में अपनी बात रखने के लिए लाखों डॉलर खर्च किए हैं। दस्तावेजों में लाखों डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट और भुगतानों का विवरण है इन प्रयासों का मकसद अमेरिकी कांग्रेस, एग्जीक्यूटिव ब्रांच, थिंक टैंक और मीडिया तक पहुंच बनाना है।
एक दस्तावेज के अनुसार, इस्लामाबाद पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने अमेरिका में लॉबिंग और जननीति से जुड़े कामों के लिए करीब नौ लाख डॉलर का भुगतान किया। यह संस्थान पाकिस्तान स्थित एक थिंक टैंक है जो पाकिस्तान के नेशनल सिक्योरिटी डिवीजन से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, अक्टूबर 2024 में हाइपरफोकल कम्युनिकेशंस एलएलसी को इस काम के लिए पंजीकृत किया गया। यह कंपनी टीम ईगल कंसल्टिंग एलएलसी के तहत सबकॉन्ट्रैक्टर के रूप में काम कर रही थी। दस्तावेजों में कहा गया है कि इसका उद्देश्य अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों को बेहतर बनाना था।

एक अन्य दस्तावेज से सामने आया है कि वाशिंगटन स्थित पाकिस्तान दूतावास ने अक्टूबर 2025 से एर्विन ग्रेव्स स्ट्रैटेजी ग्रुप एलएलसी के साथ समझौता किया। इसके तहत शुरुआती तीन महीनों के लिए हर महीने 25 हजार डॉलर का भुगतान तय किया गया। इस समझौते के तहत अमेरिकी संसद के सदस्यों और सरकारी अधिकारियों से संपर्क करना शामिल है। साथ ही नीति समूहों और थिंक टैंकों से बातचीत भी इसके दायरे में आती है। इसमें क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक सुधार जैसे मुद्दों का जिक्र है।
इसके अलावा व्यापार को बढ़ावा देने, पर्यटन और पाकिस्तान में दुर्लभ खनिजों की संभावनाओं पर भी बात की गई है। सूचीबद्ध मुद्दों में जम्मू और कश्मीर विवाद और भारत-पाकिस्तान संबंध भी शामिल हैं। इन खुलासों पर भारत में खास नजर रखी जा रही है, क्योंकि इनमें जम्मू और कश्मीर और भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर अमेरिका में लॉबिंग किए जाने का जिक्र है। एक अन्य जानकारी में बताया गया है कि पाकिस्तान दूतावास ने मई में जनसंपर्क सेवाओं के लिए क़ॉर्विस होल्डिंग इंक को भी नियुक्त किया। इसमें मीडिया आउटरीच और नैरेटिव डेवलपमेंट शामिल हैं।
अमेरिकी कानून के अनुसार, विदेशी सरकारों और उनसे जुड़े संगठनों को अपनी लॉबिंग और जनसंपर्क गतिविधियों की जानकारी सार्वजनिक करनी होती है। इन्हीं दस्तावेजों के जरिए उनके समझौते, गतिविधियां और किए गए भुगतानों का पूरा ब्योरा सामने आता है।
पाकिस्तान: सिंधी नेता ने कार्यकर्ताओं की जबरन गुमशुदगी पर संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की अपील
जेए सिंध मुत्तहिदा महाज़ (जेएसएमएम) के अध्यक्ष शाफी बुरफ़त ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे जबरन लापता किए गए सभी सिंधी राजनीतिक कार्यकर्ताओं के मामलों पर तत्काल संज्ञान लें और पाकिस्तान की सेना व खुफिया एजेंसियों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जवाबदेह ठहराएं। शाफी बुरफ़त ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसियां पूरी दंडमुक्ति के साथ काम कर रही हैं और शांतिपूर्ण राजनीतिक संघर्ष में लगे सिंधी कार्यकर्ताओं को मनमाने ढंग से गिरफ्तार कर रही हैं। उन्होंने कहा कि कई कार्यकर्ताओं को अमानवीय यातनाओं, लंबे समय तक अवैध हिरासत, जबरन गुमशुदगी और न्यायेतर हत्याओं का शिकार बनाया गया है।
बुरफ़त के अनुसार, सैकड़ों सिंधी कार्यकर्ता अब भी गुप्त हिरासत और यातना केंद्रों में बंद हैं, जहां उन्हें बिना किसी न्यायिक वारंट, औपचारिक आरोप या कानूनी प्रक्रिया के रखा गया है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा, “पाकिस्तान एक अस्वाभाविक, सत्तावादी और सैन्यीकृत राज्य में बदल चुका है, जहां ऐतिहासिक राष्ट्रों को धर्म के राजनीतिक दुरुपयोग और एक केंद्रीकृत, गैर-जवाबदेह सैन्य व्यवस्था के जरिए दबाया गया है। सिंध में इसका परिणाम सुनियोजित राजनीतिक दमन, आर्थिक शोषण और राष्ट्रीय पहचान के दमन के रूप में सामने आया है।”उन्होंने आगे कहा, “हम, सिंधी राष्ट्र, इस दमनकारी व्यवस्था को पूरी तरह खारिज करते हैं और ऐसे राज्य से मुक्ति की मांग करते हैं जो जेए सिंध मुत्तहिदा महाज़ जैसे धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलनों को अपराधी ठहराता है, जबकि धार्मिक उग्रवाद, आतंकी नेटवर्क, नस्लवाद और सामंती ताकतों को संरक्षण देता है।”

सिंधी नेता ने संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को औपचारिक रूप से सूचित किया कि इजाज़ गाहो, सरवेच नोहेनी, सोहेल भट्टी, पठान खान ज़ुहरानी और सरवेच सरगानी सहित कई सिंधी राजनीतिक कार्यकर्ता अब भी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों की अवैध हिरासत में हैं। उन्होंने बताया कि इन कार्यकर्ताओं के परिवार, माता-पिता, जीवनसाथी, बच्चे और भाई-बहन पूरी अनिश्चितता में जी रहे हैं और उन्हें यह तक नहीं पता कि उनके प्रियजन जीवित हैं या मार दिए गए हैं।
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बुरफ़त ने कहा, “ये गिरफ्तारियां और जबरन गुमशुदगियां नैतिक मूल्यों, मानवीय गरिमा के सिद्धांतों, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों और मानवीय कानून का घोर उल्लंघन हैं।” उन्होंने वैश्विक समुदाय से मांग की कि जबरन गुमशुदगी के शिकार लोगों के ठिकानों का खुलासा कराया जाए और उनकी सुरक्षित व बिना शर्त रिहाई सुनिश्चित की जाए।साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सिंधी लोगों का दर्द इस बात से और बढ़ जाता है कि शक्तिशाली देश मानवाधिकार, न्याय और उत्पीड़ित राष्ट्रों के अस्तित्व की बजाय “रणनीतिक हितों” को प्राथमिकता देते हुए पाकिस्तान को राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक समर्थन देते रहते हैं।
बुरफ़त ने कहा, “यह मिलीभगत पाकिस्तान को अपने अपराध जारी रखने की छूट देती है और उसे वैश्विक मंच पर संरक्षण व वैधता प्रदान करती है। जिस राज्य पर सुनियोजित जबरन गुमशुदगी और राजनीतिक दमन के आरोप हों, उसका ‘साझेदार’ बना रहना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नैतिक विफलता है। यह केवल सिंध के लिए त्रासदी नहीं, बल्कि वैश्विक अंतरात्मा के लिए भी गहरी शर्म की बात है।”
खैबर पख्तूनख्वा में गहराते अस्थिर हालात, मानवाधिकार आयोग ने जताई चिंता
इस्लामाबाद, 1 जनवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने वर्ष 2025 के दौरान खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में बिगड़ती सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की स्थिति पर गहरी चिंता जताई है। आयोग के अनुसार यह इलाका लगातार अस्थिर बना हुआ है और यहां बार-बार आतंकी हमले हो रहे हैं। एचआरसीपी की ताजा रिपोर्ट में इस्लामाबाद स्थित पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट एंड सिक्योरिटी स्टडीज का हवाला देते हुए बताया गया है कि जुलाई 2025 में ही पूरे देश में कम से कम 82 आतंकी हमले हुए, जिनमें से लगभग दो-तिहाई खैबर पख्तूनख्वा और उसके पूर्ववर्ती कबायली जिलों में दर्ज किए गए।
रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2025 में भी प्रांत में 45 आतंकी हमले हुए, जिनमें 54 लोगों की मौत और 49 अन्य घायल हुए। इन हमलों में से 20 घटनाएं खैबर पख्तूनख्वा के विलय किए गए जिलों में हुईं, जिनमें 21 लोगों की जान गई। मृतकों में छह पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मी, तीन आतंकी और 12 आम नागरिक शामिल थे, जबकि सात लोग घायल हुए। एचआरसीपी के अनुसार, अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) के खैबर पख्तूनख्वा प्रदेश अध्यक्ष मियां इफ्तिखार हुसैन ने सुरक्षा हालात को आम धारणा से कहीं अधिक गंभीर बताया। उन्होंने कहा कि केवल विलय किए गए जिलों में ही नहीं, बल्कि प्रांत के बसे हुए इलाकों में भी कई उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं और आतंकी संगठन दाएश (आईएसआईएस) की मौजूदगी की भी खबरें हैं।

इसी तरह, क़ौमी वतन पार्टी (क्यूडब्ल्यूपी) के प्रांतीय अध्यक्ष सिकंदर शेरपाओ के हवाले से एचआरसीपी ने कहा कि जनवरी 2025 से अब तक लगभग 550 हिंसक घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें अधिकांश विलय किए गए जिलों में हुई हैं। शेरपाओ के अनुसार, क्षेत्र में “वास्तविक आतंकी तत्वों” के साथ-साथ “नकलची गिरोह और संगठित आपराधिक नेटवर्क” भी सक्रिय हो गए हैं, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति और जटिल हो गई है। क्यूडब्ल्यूपी नेता ने वज़ीरिस्तान और बाजौर क्षेत्रों की स्थिति को विशेष रूप से गंभीर बताते हुए कहा कि दाएश या इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वहां सिविल सेवकों और पुलिसकर्मियों को देर दोपहर तक छिपने पर मजबूर होना पड़ता है।
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एचआरसीपी मिशन ने जबरन गायब किए जाने की लगातार जारी प्रथा पर भी गंभीर चिंता जताई। रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘राज्य विरोधी’ गतिविधियों के आरोप में पकड़े गए लोगों को अक्सर संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार अदालतों में पेश नहीं किया जाता। आयोग ने यह भी कहा कि पीटीएम जैसे अधिकार-आधारित आंदोलनों और एएनपी जैसी प्रगतिशील पार्टियों के खिलाफ कथित राजनीतिक उत्पीड़न लोकतांत्रिक राजनीति के लिए नुकसानदेह है। इसके साथ ही, एचआरसीपी ने प्रांत में पत्रकारों के खिलाफ सेंसरशिप, धमकी और लक्षित हमलों की खबरों पर भी चिंता जताई है, खासकर उन पत्रकारों के खिलाफ जो जबरन गुमशुदगी और आतंकी हिंसा जैसे मुद्दों पर रिपोर्टिंग कर रहे हैं।








