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Yoga Ayurveda Health Benefit: योग और आयुर्वेद से साइटिका, पाचन व इम्यूनिटी का समाधान

Yoga Ayurveda Health Benefit: योग, आयुर्वेद और सिद्ध चिकित्सा से रोगों का प्राकृतिक उपचार

Yoga Ayurveda Health Benefit: आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी, बदलती जीवनशैली और बढ़ते तनाव ने शरीर को कई तरह की समस्याओं से घेर लिया है। पीठ दर्द, साइटिका, पाचन संबंधी विकार, हार्मोनल असंतुलन, कमजोर इम्यूनिटी और मानसिक तनाव अब आम होते जा रहे हैं। ऐसे में भारत की प्राचीन योग, आयुर्वेद और सिद्ध चिकित्सा पद्धतियां न केवल उपचार बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य समाधान प्रदान करती हैं।

योगासन जैसे धनुरासन और तिर्यक भुजंगासन रीढ़ और नर्वस सिस्टम को मजबूत बनाते हैं, वहीं उज्जायी प्राणायाम पाचन अग्नि को जाग्रत कर मानसिक शांति देता है। आयुर्वेदिक औषधियां जैसे दूर्वा और द्रोणपुष्पी शरीर को भीतर से पोषण देकर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती हैं। सिद्ध चिकित्सा में वर्णित तेल स्नान मौसमी बीमारियों से बचाव और स्नायु तंत्र को सशक्त बनाने का प्रभावी उपाय है।

यह विशेष हेल्थ गाइड योग, आयुष मंत्रालय की सिफारिशों और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर तैयार की गई है, जो आपको प्राकृतिक तरीके से स्वस्थ, ऊर्जावान और रोगमुक्त जीवन की दिशा दिखाती है।

साइटिका के दर्द से बेहाल है हाल? धनुरासन से मिलेगा आराम

साइटिका एक आम लेकिन तकलीफदेह समस्या है जो पीठ के निचले हिस्से से शुरू होकर कूल्हे, जांघ और पैर तक तेज दर्द पहुंचाती है। यह शरीर की सबसे बड़ी नर्व यानी साइटिक नर्व के दबने या उसमें सूजन आने के कारण होती है। राहत की बात यह है कि योगासन से इस समस्या को मात दी जा सकती है।

साइटिका के लक्षणों में तेज दर्द के अलावा सुन्नपन, झुनझुनी महसूस होना या पैर में कमजोरी शामिल हो सकती है। ज्यादातर मामलों में इसका कारण हर्नियेटेड डिस्क (स्लिप डिस्क) या हड्डियों में स्पर्स बनना होता है। अच्छी बात यह है कि आराम, फिजियोथेरेपी और योग अभ्यास से यह समस्या काफी हद तक नियंत्रित या ठीक हो सकती है।

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भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अनुसार, धनुरासन या बो पोज का रोजाना अभ्यास करना साइटिका में कारगर होता है। मंत्रालय के अनुसार, धनुरासन सिर्फ व्यायाम नहीं, बल्कि कई शारीरिक समस्याओं का रामबाण इलाज है। यह आसन खासतौर पर पीठ दर्द, साइटिका और स्लिप डिस्क जैसी समस्याओं में राहत देता है। इसके नियमित अभ्यास से साइटिक नर्व पर दबाव कम होता है, रीढ़ की हड्डी मजबूत बनती है और दर्द में आराम मिलता है।

एक्सपर्ट के अनुसार, धनुरासन पाचन संबंधी समस्याओं जैसे कब्ज, अपच और गैस में भी बेहद फायदेमंद है, क्योंकि यह पेट की मांसपेशियों पर दबाव डालकर अंगों को उत्तेजित करता है। धनुरासन के अन्य लाभ भी कम नहीं हैं। यह पीठ, कंधे और छाती की मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, जिससे पोस्चर सुधरता है और कमर दर्द से छुटकारा मिलता है। पेट की मांसपेशियों को टोन करता है, जिससे पेट की चर्बी कम करने में मदद मिलती है। फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है, सांस संबंधी समस्याओं जैसे अस्थमा में राहत देता है। तनाव और थकान दूर कर ऊर्जा स्तर बढ़ाता है।

यही नहीं, यह महिलाओं में पीरियड्स की अनियमितता और दर्द को कम करने में मददगार है। कुल मिलाकर, यह पूरे शरीर की लचीलापन बढ़ाता है और पूरे शरीर की सेहत सुधारता है।

धनुरासन करने के लिए पेट के बल लेटें, पैरों की एड़ियों को हाथों से पकड़ें और छाती व जांघों को ऊपर उठाएं, शरीर को धनुष की तरह मोड़ें। शुरुआत में 10-20 सेकंड तक रखें और धीरे-धीरे बढ़ाएं। लेकिन गर्भवती महिलाएं, हाई ब्लड प्रेशर या गंभीर पीठ समस्या वाले लोग डॉक्टर या योग विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही अभ्यास करें।

तेल स्नान: मौसमी बीमारियों से मिलेगी सुरक्षा, मजबूत होगा शरीर

मौसम के बदलते ही शरीर पर सबसे पहले अटैक मौसमी बीमारियों का होता है। ऐसे में तेल स्नान बेहद कारगर होता है। सिद्ध प्रणाली की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में तेल स्नान को एक महत्वपूर्ण और प्रभावी अभ्यास के रूप में मान्यता प्राप्त है।

तेल स्नान का प्राचीन तरीका न केवल शरीर की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को बढ़ाता है, बल्कि संवेदी अंगों को मजबूत बनाता है और मौसमी बीमारियों से बचाव भी करता है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अनुसार, हर चार दिन में एक बार इस निवारक विधि को अपनाने से पूरे स्वास्थ्य को बड़ा लाभ मिल सकता है।

सिद्ध चिकित्सा दक्षिण भारत की प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली है, जो आयुर्वेद से प्रेरित है। तेल स्नान को 11 सबसे जरूरी उपचारों में से एक माना जाता है। इसका उपयोग विभिन्न बीमारियों को रोकने और उन्हें नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। यह एक सरल घरेलू उपाय है, जो रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी से शामिल किया जा सकता है।

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तेल स्नान करने की विधि बहुत आसान है। इसके लिए सबसे पहले पूरे शरीर और सिर (स्कैल्प) पर तिल का तेल या शुद्ध गाय का घी अच्छी तरह लगाएं। तेल को कुछ देर शरीर पर रहने दें ताकि यह त्वचा में अच्छे से समा सके। इसके बाद तेल को हटाने के लिए पारंपरिक हर्बल बाथ पाउडर, जिसे पंचकर्पम कहा जाता है, का उपयोग करें। यह हर्बल पाउडर प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से बना होता है और त्वचा को साफ करने के साथ-साथ ताजगी देता है।

तेल स्नान की इस प्रक्रिया को नियमित रूप से हर चार दिन में एक बार दोहराने से शरीर की इम्यूनिटी मजबूत होती है। खासकर मौसम बदलने पर होने वाली सर्दी-जुकाम, बुखार जैसी बीमारियों से बचाव होता है। साथ ही यह मांसपेशियों और नसों को मजबूती देता है, जिससे मोटर फंक्शन बेहतर होते हैं और संवेदी अंग जैसे त्वचा, आंखें आदि स्वस्थ रहते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे सरल उपाय आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी आसानी से अपनाए जा सकते हैं और लंबे समय तक स्वास्थ्य लाभ देते हैं। इस्तेमाल से पहले वैद्य से सलाह जरूर लें।

रीढ़ की हड्डी को लचीला, पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है तिर्यक भुजंगासन

आज के समय में व्यस्त दिनचर्या और गड़बड़ खानपान से शरीर जल्दी रोगों की चपेट में आ जाता है। ऐसे में तिर्यक भुजंगासन का नियमित अभ्यास शरीर को कई लाभ पहुंचाता है। यह आसन रीढ़ की हड्डी को लचीला और मजबूत बनाता है, पीठ दर्द दूर करता है तथा पाचन तंत्र को सुधारता है।

मोरारजी देसाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ योगा के अनुसार भुजंगासन के एक रूप का नाम ही तिर्यक भुजंगासन है। इसके अभ्यास से कब्ज की समस्या कम होती है, और लीवर-किडनी सक्रिय रहते हैं। सरल और प्रभावी आसन के रोजाना अभ्यास से सेहत बेहतर होती है।

तिर्यक भुजंगासन में ट्विस्टिंग की मुद्रा जोड़ी जाती है। ‘तिर्यक’ का अर्थ तिरछा या घुमावदार होता है, जबकि ‘भुजंगासन’ कोबरा पोज के नाम से जाना जाता है। यह आसन रीढ़ की हड्डी को मजबूत और लचीला बनाने के साथ-साथ पेट के आंतरिक अंगों को सक्रिय करता है।

तिर्यक भुजंगासन करने की विधि आसान है। इसके लिए सबसे पहले पेट के बल जमीन पर लेट जाएं। दोनों पैरों को सीधा रखें और एड़ियों को आपस में मिला लें। हथेलियों को कंधों के पास जमीन पर रखें। सांस भरते हुए ऊपरी शरीर को ऊपर उठाएं, जैसे भुजंगासन में करते हैं। अब सिर और धड़ को दाईं ओर घुमाएं और बाएं पैर की एड़ी को देखने की कोशिश करें। कुछ सेकंड रुकें, फिर सामान्य स्थिति में आएं। इसी प्रक्रिया को बाईं ओर दोहराएं। यह एक चक्र पूरा होता है। शुरुआत में 3-5 चक्र करें और धीरे-धीरे बढ़ाएं।

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इस आसन के नियमित अभ्यास से रीढ़ की हड्डी मजबूत और लचीली होती है, जिससे पीठ दर्द और पोस्चर संबंधी समस्याओं में राहत मिलती है। यह पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है, क्योंकि ट्विस्टिंग से आंतों पर दबाव पड़ता है और कब्ज जैसी समस्या दूर होती है। पेट के अंग जैसे लीवर, किडनी और आंतें सक्रिय होकर बेहतर कार्य करती हैं। फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है, सांस की प्रक्रिया सुचारू होती है, और छाती चौड़ी होती है।

महिलाओं के लिए यह आसन विशेष रूप से फायदेमंद है, क्योंकि यह पीरियड्स संबंधी अनियमितताओं और स्त्री रोगों में राहत देता है। नर्वस सिस्टम को स्वस्थ रखता है और तनाव कम करता है। कंधे, बाहें और जांघें लचीली बनती हैं, साथ ही कमर की चर्बी घटाने में भी मदद मिलती है। यह आसन कुंडलिनी जागरण और शरीर की ऊर्जा बढ़ाने में भी सहायक माना जाता है।

योग विशेषज्ञों के अनुसार, तिर्यक भुजंगासन को दैनिक रूटीन में शामिल करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों मजबूत होते हैं। हालांकि, कुछ सावधानियां बरतनी जरूरी हैं। गर्भवती महिलाएं, कमर या गर्दन में गंभीर चोट वाले व्यक्ति, और हर्निया या अल्सर के मरीज इस आसन से बचें। हाई ब्लड प्रेशर वाले लोग भी सलाह लेकर तिर्यक भुजंगासन करें। आसन हमेशा खाली पेट और योग विशेषज्ञ की देखरेख में करें।

ब्लड प्रेशर नियंत्रित कर एनीमिया दूर करती है दूर्वा, सेवन से मिलते कई लाभ

विघ्न विनाशन भगवान गणेश की पूजा में कोमल हरी दूर्वा (दूब घास) अर्पित किए बिना अधूरी समझी जाती है। यह सामान्य सी दिखने वाली घास औषधीय गुणों से भरपूर मानी जाती है। दूर्वा में कैल्शियम, आयरन, फॉस्फोरस, फाइबर, प्रोटीन और पोटैशियम जैसे आवश्यक पोषक तत्व भरपूर होते हैं, जो विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से राहत प्रदान करने में सहायक हैं।

आयुर्वेद में दूर्वा को गुणों की खान कहा जाता है। यह पेट के रोगों से लेकर मानसिक शांति प्रदान करने में फायदेमंद है। दूर्वा का रस पीने से एनीमिया की समस्या दूर हो सकती है, क्योंकि यह हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाता है और रक्त शुद्ध करता है। दूर्वा पर नंगे पांव चलने के फायदे भी हैं।

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सुबह-शाम हरी दूब पर टहलने से माइग्रेन का दर्द कम होता है, ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है, तनाव दूर होता है, और आंखों की रोशनी बढ़ती है। यह हृदय स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है। आयुर्वेदाचार्य बताते हैं कि पार्क या बगीचे में मिलने वाली यह घास शरीर को राहत प्रदान करती है।

ताजी दूर्वा को धोकर पीस लें और इसका रस निकालकर पीएं। इससे इम्यूनिटी मजबूत होती है, महिलाओं को पीरियड्स के दर्द में राहत मिलती है, और कब्ज की समस्या दूर हो जाती है। माइग्रेन या सिरदर्द में दूर्वा जूस का नियमित सेवन फायदेमंद है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, शरीर में ऐंठन, दांत दर्द, मसूड़ों से खून आना या मुंह के छाले हों तो दूर्वा के रस में शहद या घी मिलाकर लगाने या पीने से तुरंत आराम मिलता है। आयुर्वेद में दूर्वा को पाचन तंत्र मजबूत करने, इम्यूनिटी बढ़ाने और त्वचा संबंधी समस्याओं में भी उपयोगी माना गया है।

यह साधारण घास न केवल पूजा में विशेष स्थान रखती है, बल्कि रोजमर्रा की स्वास्थ्य समस्याओं का प्राकृतिक उपचार भी है। नियमित उपयोग से कई रोगों से बचाव संभव है। हालांकि, सेवन से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

उज्जायी: कफ-वात नाशक और अग्नि जाग्रत करने वाला प्राणायाम, जानें लाभ

अक्सर हम योग और प्राणायाम को सिर्फ शारीरिक व्यायाम समझ लेते हैं, लेकिन कुछ श्वास तकनीकें ऐसी होती हैं जो शरीर के अंदर गहराई तक असर करती हैं। उज्जायी प्राणायाम उन्हीं में से एक है। इसे करते समय गले से निकलने वाली हल्की समुद्र जैसी आवाज इसकी पहचान है। यही वजह है कि इसे ओशन ब्रीथ भी कहा जाता है।

आयुर्वेद की दृष्टि से उज्जायी केवल सांस लेने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि कफ और वात को संतुलित करने और पाचन अग्नि को जाग्रत करने वाला प्रभावशाली प्राणायाम माना गया है।

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आयुर्वेद में स्वास्थ्य की जड़ पाचन को माना गया है। अगर जठराग्नि ठीक है, तो शरीर खुद ही कई रोगों से बचा रहता है। उज्जायी प्राणायाम श्वास को धीमा, गहरा और नियंत्रित बनाता है, जिससे शरीर के अंदर हल्की गर्मी उत्पन्न होती है। यही आंतरिक गर्मी पाचन अग्नि को सक्रिय करती है। जिन लोगों को बार-बार अपच, गैस, भारीपन या भूख कम लगने की समस्या रहती है, उनके लिए उज्जायी प्राणायाम सहायक माना जाता है।

कफ और वात दोष आज की जीवनशैली में सबसे ज्यादा बिगड़ते हैं। कफ बढ़ने पर आलस्य, जकड़न, बलगम और सर्दी-जुकाम जैसी समस्याएं आती हैं, जबकि वात बिगड़ने पर गैस, बेचैनी, अनिद्रा और घबराहट बढ़ जाती है। उज्जायी प्राणायाम श्वास-प्रश्वास को लय में लाकर इन दोनों दोषों को संतुलित करने में मदद करता है। गले और छाती के क्षेत्र में होने वाला हल्का घर्षण कफ को ढीला करता है और वात को स्थिर करता है।

इस प्राणायाम का असर सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मन पर भी गहरा प्रभाव डालता है। उज्जायी करते समय ध्यान अपने आप सांस की आवाज पर टिक जाता है। इससे मन भटकता नहीं और तनाव धीरे-धीरे कम होने लगता है। जो लोग जल्दी घबरा जाते हैं, बेचैन रहते हैं या नींद की समस्या से जूझते हैं, उनके लिए यह प्राणायाम बेहद उपयोगी माना जाता है। यह तंत्रिका तंत्र को शांत करता है और शरीर को विश्राम की अवस्था में ले जाता है।

उज्जायी का एक महत्वपूर्ण लाभ गले और थायराइड क्षेत्र पर भी माना जाता है। गले से होकर नियंत्रित सांस का आना-जाना इस हिस्से को सक्रिय रखता है। आयुर्वेद और योग में इसे विशुद्धि चक्र से जोड़ा गया है, जो अभिव्यक्ति, संतुलन और शुद्धता का केंद्र माना जाता है। नियमित अभ्यास से आवाज में स्पष्टता और आत्मविश्वास में भी सुधार देखा जाता है।

द्रोणपुष्पी: घर में आसानी से उगने वाला सुपर हर्ब, बीमारियों को रखे कोसों दूर

द्रोणपुष्पी आपके घर की छत या बगीचे में उगने वाला एक छोटा-सा पौधा है जो दिखने में भले ही आम लगे, लेकिन इसमें सेहत का खजाना छिपा हुआ है। इसे कई जगहों पर दुद्धी, गोफन, दूरवा, शिवसहस्त्रपुष्पी या सफेद फूल वाली नेटलवीड भी कहा जाता है।

इसकी पहचान भी बहुत आसान है। इसकी पत्तियां लंबी और हल्की दांतेदार, तना पतला लेकिन मजबूत और सफेद छोटे-छोटे गुच्छों में फूल होते हैं। जब आप पत्तों को मसलेंगे तो हल्की औषधीय खुशबू महसूस होगी।

https://x.com/shyam_ayurveda/status/2006644714242715834?s=20

इस पौधे का आयुर्वेद में बड़ा महत्व है। द्रोणपुष्पी को वात-कफ में लाभकारी माना गया है। यह हमारे पाचन, श्वसन और प्रतिरोधक क्षमता के लिए बहुत फायदेमंद है। सबसे पहले तो सर्दी-जुकाम और खांसी में यह सुपरहिट है। आप इसके पत्तों का काढ़ा बनाकर पी सकते हैं या पत्तों और फूल का रस निकालकर शहद के साथ ले सकते हैं। वायरल बुखार, खासकर मच्छरजनित बुखार में भी गर्म पानी के साथ इसका सेवन राहत देता है।

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द्रोणपुष्पी सिर्फ अंदर से फायदा नहीं करती, बल्कि बाहरी चोट या त्वचा की समस्या में भी कमाल दिखाती है। घाव, फोड़े-फुंसी पर पत्तों का लेप लगाने से सूजन कम होती है और घाव जल्दी ठीक होता है। मच्छर या कीड़े के काटने पर मसलकर सीधे लगाने से जलन और खुजली में राहत मिलती है। पेट की गैस या हल्की अपच में सूखी पत्तियों का पाउडर काम आता है। यहां तक कि कान दर्द में हल्की गर्म पत्ती का रस 1–2 बूंद डालना पारंपरिक घरेलू तरीका माना जाता है।

इसे घर में उगाना भी बेहद आसान है। हल्की मिट्टी और थोड़ी धूप में यह जल्दी बढ़ता है। बीज अपने आप गिरकर पौधे उगाते हैं। पानी की जरूरत भी ज्यादा नहीं होती। सप्ताह में 2-3 बार पर्याप्त है। इसका रोजमर्रा में उपयोग सुरक्षित है, लेकिन गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली माताएं इसे बिना वैद्य की सलाह के न लें।

वैज्ञानिक रूप से भी यह पौधा प्रभावशाली है। इसमें एंटी-वायरल, एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-फंगल और दर्द निवारक गुण पाए गए हैं। एलर्जी और सूजन में यह राहत देता है और प्राकृतिक रूप से मच्छरों को दूर रखता है। इसलिए इसे आयुर्वेद में सुपर हर्ब कहा गया है।

सर्दियों में रूखी त्वचा से परेशान? घर पर बनाएं नेचुरल स्क्रब, पाएं चमकदार त्वचा

सर्दियों का मौसम त्वचा के लिए एक चुनौती बन जाता है। ठंडी हवा और कम नमी के कारण हमारी त्वचा रूखी और बेजान महसूस होने लगती है। यह समस्या त्वचा पर डेड सेल्स जमा होने के कारण होती हैं। सर्दियों में ब्लड सर्कुलेशन धीमा हो जाता है और त्वचा को जरूरी पोषण नहीं मिल पाता। ऐसे में बॉडी एक्सफोलिएशन यानी त्वचा की सफाई करना बेहद जरूरी हो जाता है।

नेचुरल बॉडी स्क्रब सर्दियों में बेहद फायदेमंद साबित होता है, जिसे आप घर पर भी बनाकर इस्तेमाल कर सकते हैं।

चीनी और नारियल तेल का स्क्रब:- चीनी एक बेहतरीन नेचुरल एक्सफोलिएटर है। यह त्वचा से डेड सेल्स को हटाने में मदद करती है। नारियल तेल स्किन को गहराई से मॉइस्चराइज करता है और रूखापन दूर करता है। इस स्क्रब को बनाने के लिए बस दो चम्मच चीनी में एक चम्मच नारियल तेल मिलाएं। इसे नहाने से पहले हल्के हाथों से पूरे शरीर पर मसाज करें और फिर गुनगुने पानी से धो लें। नियमित इस्तेमाल से त्वचा सर्दियों में भी मुलायम और चमकदार बनी रहती है।

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कॉफी और ऑलिव ऑयल का स्क्रब:- कॉफी न केवल थकान कम करने में मदद करती है, बल्कि त्वचा को स्मूथ और टाइट बनाने में भी लाभकारी है। ऑलिव ऑयल त्वचा को पोषण देता है और उसे रूखेपन से बचाता है। इस स्क्रब को बनाने के लिए दो चम्मच कॉफी पाउडर में एक चम्मच ऑलिव ऑयल मिलाएं। इसे खासतौर पर कोहनी, घुटनों और एड़ियों पर लगाएं। नियमित इस्तेमाल से यह त्वचा को मुलायम, चमकदार और स्वस्थ बनाता है।

ओट्स और शहद का स्क्रब:- सेंसिटिव और ड्राई स्किन के लिए ओट्स और शहद का स्क्रब बहुत अच्छा विकल्प है। ओट्स में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो खुजली और जलन को कम करते हैं। शहद त्वचा को नमी देता है और उसे पोषण पहुंचाता है। दो चम्मच पिसे हुए ओट्स में एक चम्मच शहद मिलाएं और जरूरत हो तो थोड़ा दूध डालें। इस मिश्रण को त्वचा पर सर्कुलर मोशन में लगाएं। यह स्क्रब त्वचा को न केवल सॉफ्ट बनाता है, बल्कि प्राकृतिक चमक भी देता है।

 

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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