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CPI at 100: 1925 का CPI सवाल छुआछूत, खादी और अधूरी आज़ादी

CPI at 100: छुआछूत, खादी और कांग्रेस: 1925 का कम्युनिस्ट प्रश्न आज भी क्यों प्रासंगिक है?

CPI at 100: जब भारत अपनी स्वतंत्रता के सौ वर्षों की ओर बढ़ रहा है, तब यह ज़रूरी हो जाता है कि हम आज़ादी के आंदोलन के भीतर मौजूद उन वैचारिक धाराओं को भी देखें, जिन्हें अक्सर हाशिये पर डाल दिया गया। दिसंबर 1925 में कानपुर में आयोजित कम्युनिस्ट सम्मेलन और उसमें एम. सिंगारवेलु चेट्टियार का अध्यक्षीय भाषण ऐसी ही एक ऐतिहासिक धारा का प्रतिनिधित्व करता है—जो राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं मानती थी, बल्कि उसे आर्थिक और सामाजिक क्रांति से जोड़कर देखती थी। यह भाषण इसलिए भी असहज करता है, क्योंकि यह महात्मा गांधी, कांग्रेस और सामाजिक सुधार के प्रचलित नैरेटिव्स पर सीधे सवाल उठाता है।

छुआछूत: नैतिकता बनाम अर्थशास्त्र

सिंगारवेलु का सबसे तीखा और विवादास्पद तर्क छुआछूत को लेकर था। उन्होंने इसे धार्मिक या सामाजिक बुराई मानने के बजाय “शुद्ध रूप से आर्थिक समस्या” कहा।
यह दृष्टिकोण उस समय के सुधारवादी विमर्श से टकराता था, जो मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक स्थलों तक पहुँच और नैतिक अपीलों को समाधान मानता था।

सिंगारवेलु का सवाल सीधा था—
अगर दलित और वंचित समुदाय भूमिहीन, मज़दूरी पर निर्भर और भूखे हैं, तो केवल सामाजिक प्रतीकों से उनकी स्थिति कैसे बदलेगी?

आज, जब हम सामाजिक न्याय की बात करते हैं, तब भी यह बहस जीवित है—क्या पहचान की राजनीति आर्थिक पुनर्वितरण के बिना टिकाऊ बदलाव ला सकती है?

खादी: प्रतीक या समाधान?

गांधी की खादी मुहिम स्वतंत्रता संग्राम का नैतिक और सांस्कृतिक प्रतीक बन चुकी थी। लेकिन सिंगारवेलु ने इसे “खराब अर्थशास्त्र” कहा।
उनका तर्क था कि भूखे मज़दूर से चरखे पर और मेहनत करने को कहना मानवीय प्रगति की दिशा के विरुद्ध है।

यह आलोचना केवल खादी की नहीं थी, बल्कि उस सोच की थी जो प्रतीकों को संरचनात्मक बदलाव का विकल्प मान लेती है।
आज भी यह सवाल उतना ही प्रासंगिक है—क्या आत्मनिर्भरता के नारे तब तक सार्थक हैं, जब तक वे उत्पादकता, तकनीक और श्रम की गरिमा को केंद्र में न रखें?

कांग्रेस और बुर्जुआ राजनीति

सिंगारवेलु का कांग्रेस पर हमला वैचारिक था, व्यक्तिगत नहीं।
उन्होंने स्वीकार किया कि गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक समय “जीवंत शक्ति” थी, लेकिन उनका आरोप था कि कांग्रेस:

  • स्वराज को स्पष्ट सामाजिक-आर्थिक अर्थ नहीं दे सकी
  • मजदूरों और किसानों को राजनीतिक केंद्र में नहीं ला पाई
  • सत्ता की राजनीति में उलझ गई

उनका निष्कर्ष था कि बुर्जुआ वर्ग के नेतृत्व में पूर्ण स्वतंत्रता संभव नहीं
यह आलोचना आज की राजनीति पर भी लागू होती है, जहाँ चुनावी लोकतंत्र अक्सर आर्थिक असमानताओं को छूने से कतराता है।

बुद्ध, ईसा और कम्युनिज़्म: भारतीयकरण की कोशिश

सिंगारवेलु द्वारा बुद्ध और ईसा मसीह को “कम्युनिस्ट परंपरा” में रखना, दरअसल कम्युनिज़्म को भारतीय और नैतिक परंपरा से जोड़ने का प्रयास था।
यह संदेश स्पष्ट था—समानता, साझा संसाधन और शोषण-विरोध कोई विदेशी विचार नहीं हैं।

यह दृष्टि आज के उस विमर्श से अलग थी, जो वामपंथ को केवल “विदेशी आयात” बताकर खारिज कर देता है।

लेनिन और तिलक: विरोधाभास नहीं, संगति

लेनिन की प्रशंसा और लोकमान्य तिलक को श्रद्धांजलि—यह संयोजन बताता है कि शुरुआती भारतीय कम्युनिस्ट राष्ट्रवाद और अंतरराष्ट्रीयवाद के बीच संवाद चाहते थे, टकराव नहीं।
उनके लिए लक्ष्य था—शोषण से मुक्ति, चाहे वह औपनिवेशिक हो या देशी।

https://x.com/facet9949/status/2004998015107702984?s=20

आज के भारत के लिए संदेश

1925 का यह भाषण हमें असहज करता है, क्योंकि यह पूछता है:

  • क्या सामाजिक सम्मान आर्थिक सुरक्षा के बिना संभव है?
  • क्या राष्ट्रवाद प्रतीकों से आगे जाकर संरचनात्मक अन्याय से टकराने को तैयार है?
  • क्या लोकतंत्र केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित रहेगा या आर्थिक न्याय भी सुनिश्चित करेगा?

इन सवालों के उत्तर आसान नहीं हैं, लेकिन इन्हें टालना भी संभव नहीं।

इतिहास नहीं, आईना

सिंगारवेलु का भाषण कोई बीता हुआ दस्तावेज़ नहीं, बल्कि आज के भारत के सामने रखा गया आईना है।
यह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन की मांग करती है।

https://tesariaankh.com/world-science-day-10-november-peace-and-development-2025-theme/

शायद यही कारण है कि सौ साल बाद भी, 1925 का कम्युनिस्ट सवाल अब तक पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुआ है।

 

 

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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