Mobile Syndrome: अब एक भयावह सत्य सामने आ रहा है कि किशोर-किशोरियों में **मोबाइल फोन और स्क्रीन लत** तेजी से स्वास्थ्य-संकट बनती जा रही है। भारत व अन्य देशों के मेडिकल कॉलेजों एवं शोधपत्रों के अनुसार, बच्चों में लंबे समय तक मोबाइल-स्क्रीन उपयोग से नींद-विकार, मानसिक तनाव, आंख-दृष्टि की समस्या और सामाजिक अलगाव के लक्षण बढ़ रहे हैं। हाल के एक भारतीय अध्ययन में पाया गया कि 16,292 किशोरों एवं युवा वयस्कों में यदि स्मार्टफोन स्क्रीन-टाइम **2 घंटे से अधिक** हो, तो नींद-समस्या की संभावना लगभग 1.55 गुणा (प्रतिनिधि अनुपात AOR = 1.55; CI: 1.21-1.99) है। विशेष रूप से किशोरी लड़कियों में तीन घंटे से अधिक उपयोग के बाद नींद विकार का जोखिम लगभग 2.94 गुणा था।
एक अन्य अध्ययन में जम्मू-कश्मीर के किशोरों ने बताया कि 6–8 घंटे प्रतिदिन स्क्रीन-वापर वाले समूह में 57.2 % को “खराब नींद” थी, जबकि 9.5 % को यहाँ तक कि नींद की गोली लेनी पड़ी।
नींद मात्र समस्या नहीं रह गई — स्क्रीन-लत का प्रभाव मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के King George’s Medical University (KGMU) के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बच्चों में लंबे स्क्रीन-समय से मायोपिया (निकटदृष्टि), मोटापा, ध्यान-सरणी में कमी, और आत्महत्या-संबंधी विचार बढ़ रहे हैं। उदाहरण-स्वरूप, एक मामला यह है कि 15 वर्षीय छात्र ने मोबाइल फोन देने से इंकार किए जाने के बाद कथित रूप से आत्महत्या कर ली।
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हालाँकि यह स्पष्ट नहीं कि मोबाइल उपयोग ने सीधे आत्महत्या को “कारण” बनाया है — लेकिन मोबाइल-लत तथा मानसिक विकारों (उदाहरण के लिए ansiedade, डिप्रेशन, सामाजिक अलगाव) के बीच कई अध्ययन एसोसिएशन दर्ज कर रहे हैं।
दृष्टि विकार बढ़ रहे— एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का औसत स्क्रीन-समय 2.22 घंटे प्रति दिन है, जो कि सुरक्षित सीमा (1 घंटे या उससे कम) से लगभग दोगुनी है। ([Cureus][6]) स्क्रीन-टाइम के बढ़ने से बच्चों की परंपरागत खेल-कूद, सामाजिक संवाद और शारीरिक गतिविधि में कमी आ रही है, जिससे मोटापा तथा दृष्टि-विकार का खतरा बढ़ता है।
विज्ञान इस निष्कर्ष पर आ गया है कि मोबाइल/स्क्रीन का उपयोग “सीमित और आवश्यक सेवाओं तक” रखना स्वास्थ्य-दृष्टि से फायदेमंद हो सकता है। उदाहरण के लिए सोने से पहले 1 घंटा स्क्रीन-ब्रेक देना नींद-गुणवत्ता में सुधार लाता है। स्कूल-स्तर, परिवार और चिकित्सा-संस्थान मिलकर ‘फोन-मुक्त समय’, डिवाइस-फ्री क्षेत्र, निर्धारित स्क्रीन-घंटे जैसे नियम बना सकते हैं। इंडियन अध्ययन सुझाव देते हैं कि स्मार्टफोन зависимости को नियंत्रित करने के लिए समय-सीमा, ऑफलाइन गतिविधियों का प्रोत्साहन, राष्ट्रीय जागरूकता-प्रोग्राम आवश्यक हैं।
https://x.com/divya5401450665/status/1956916827445191152?s=20
जहाँ तक **मोबाइल रेडिएशन** (वायरलेस-फ्रीक्वेंसी) द्वारा कैंसर या न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों का जोखिम है, वहाँ वर्तमान साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं और इसलिए इस रिपोर्ट में उन दावों पर चर्चा नहीं की गई। विवेचना का केंद्र स्क्रीन-समय व मॉबाइल-लत से उत्पन्न संरक्षित स्वास्थ्य-खतरे हैं। निष्कर्षतः, मोबाइल तकनीक हमारी जीवनशैली में अभिन्न हो चुकी है, पर आज हमें यह चिंतन करना महत्वपूर्ण है कि क्या हम इसे “सर्वत्र, असीमित” उपयोग के रूप में स्वीकार करें या “सीमित, आवश्यक” स्थिति में उपयोग को प्राथमिकता दें। बच्चों और किशोरों के लिए विशेष रूप से यह सुझाव है कि परिवार में रात का एक घंटा मोबाइल-मुक्त, बिस्तर पर स्क्रीन न उपयोग और दिन में कम-से-कम एक मोबाइल-बाह्य गतिविधि अनिवार्य हो। यदि यह न हुआ, तो एक दशक बाद हम मोबाइल-लत की “चुपचाप बढ़ती महामारी” का सामना कर सकते हैं।








