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Kans Vadh Mela 2025: मथुरा में कंस वध मेले की धूम, गूंजा जय श्रीकृष्ण

Kans Vadh Mela 2025: धार्मिक नगरी मथुरा में हर साल की तरह इस बार भी कंस वध मेले की धूम है। यह मेला कार्तिक माह की दशमी तिथि यानी आज 1 नवंबर को मनाया जा रहा है। बच्चे बूढें सभी में इस मेले को लेकर उत्साह है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अत्याचारी राजा कंस के वध की याद में आयोजित यह मेला अब केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का पर्व बन चुका है। जिससे .यह लोक परंपरा और जीवंतता को और निखार देता है।

कहते हैं कि जिस दिन भगवान कृष्ण ने मथुरा के अत्याचारी कंस का वध किया था, उस दिन मथुरा और गोकुल की गलियों में उत्सव और उल्लास का माहौल रहा। लोग एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे, ढोल-नगाड़ों की थाप पर झूम रहे थे। उसी ऐतिहासिक दिन की याद में आज भी मथुरा में यह मेला पूरे जोश और आस्था के साथ मनाया जाता है। कंस वध की ऐतिहासिक घटना लोक संस्कृति का एक अंग बन चुकी है।

मेले में धार्मिक झांकियां और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मेला

कंस वध मेले की शुरुआत भागवत भजन और संकीर्तन से होती है। मथुरा के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। शाम ढलते ही पूरा नगर रंग-बिरंगी झांकियों, रासलीलाओं और नृत्य-नाटिकाओं से जीवंत हो उठता है। मेले का सबसे रोचक और प्रतीकात्मक क्षण वह होता है जब कंस के पुतले को सजा-धजाकर नगर के बीच लाया जाता है। कहीं पर लोग लाठियों से पुतले को पीटते हैं, तो कहीं रस्सियों से बांधकर गलियों में घसीटा जाता है। यह दृश्य उस जनआक्रोश का प्रतीक है जो कभी मथुरा के लोगों ने कंस के अत्याचारों के खिलाफ महसूस किया था।

कुछ स्थानों पर अंत में कंस के पुतले का दहन किया जाता है, मानो बुराई का अंत अग्नि में समर्पित किया जा रहा हो। जैसे रावण दहन दशहरे का प्रतीक है, वैसे ही कंस दहन मथुरा की लोकआस्था और परंपरा का प्रतीक बन गया है।

नगर के प्रमुख स्थल – लाट साहब पार्क, दाऊजी मंडी और विश्राम घाट – इस दौरान रंग-बिरंगी रोशनी से सजाए जाते हैं। कलाकार भगवान कृष्ण, बलराम और कंस के चरित्रों को मंच पर जीवंत करते हैं। सबसे रोमांचक क्षण तब आता है जब मंच पर भगवान कृष्ण द्वारा कंस का वध दर्शाया जाता है — दर्शक जयघोष से पूरा वातावरण गुंजा देते हैं।

लोककला और व्यापार का संगम

मेले में धार्मिक भावनाओं के साथ-साथ लोकसंस्कृति का रंग भी देखने को मिलता है। जगह-जगह पर हस्तशिल्प की दुकानें, पारंपरिक मिठाइयों के स्टॉल, झूले और खेल-कूद के आयोजन लगते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के लिए मनोरंजन का भरपूर इंतजाम होता है।

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अर्थ और आस्था का संगम

कंस वध मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक भी है। जिस तरह त्रेता युग में भगवान राम ने रावण का वध कर दशहरे की परंपरा दी, उसी तरह द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने कंस के आतंक का अंत कर मथुरा को भयमुक्त किया।

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हर साल मथुरा की गलियों में जब कृष्ण की लीलाओं का मंचन होता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो द्वापर युग फिर लौट आया हो। श्रद्धालु और पर्यटक दोनों ही इस मेले में भाग लेकर आस्था, उल्लास और संस्कृति की अनोखी झलक का अनुभव करते हैं।
मथुरा का कंस वध मेला यह संदेश देता है कि किसी भी युग में अन्याय और अत्याचार का अंत निश्चित है। जिस तरह त्रेता युग में भगवान राम ने रावण का वध कर धर्म की स्थापना की थी, उसी तरह द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने कंस के अत्याचार का अंत कर मथुरा को भयमुक्त किया। हर साल जब कृष्ण की यह लीला मंचित होती है और लोग “जय श्रीकृष्ण” के नारे लगाते हैं, तो ऐसा लगता है मानो द्वापर युग फिर से लौट आया हो।

Tesari Aankh
Author: Tesari Aankh

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